बहुत दिनों से साइकिल पर लॉन्ग ड्राइव का प्लान करता पर अमल में नहीं आता। कारण यह भी था हमारी मेमसाब को साइकिल चलाना ठीक से जमती नहीं। वो गाड़ी भगा सकती है पर साइकिल नहीं। मित्र प्रताप राव जी को और भी अनेकों से बात हुई पर बात बात बन कर रह गई थी।
कल लेट शाम को ऑफिस में प्लान बनाया, स्टाफ को बोला “चलो कल सुबह ६.०० से ६.३० के बीच साइकिल लेकर घूमने जाएंगे।” इतवार है, छुट्टी है, घर पर मेमसाब भी नहीं है। उन्होंने भी हां भर दी। मैंने कहा “सबको बोलो जितने आयेंगे उतना अच्छा।”
सुबह ६.०५ बजे घर के बाहर आया, गणेश घाट पर कोई नहीं दिखा, जहां हम सब इक्कठा होने वाले थे। ६.३० बज गए फिरभी कोई नहीं पहुंचा। सोचा चलो तब तक कॉफी बनाकर पी लेते हैं। कॉफी भी हो गई। फिर सोचा चलो मुंबई से मेमसाब का फोन आने से पहले आज मैं ही फोन लगा लेता हूं ताकि उन्हें महसूस हो पति भी केयर करता है। वैसे केयर तो हर हसबैंड करता ही है जैसे बीबी हसबैंड का केयर करती है। तरीके अलग अलग होते हैं। पर मुझे आज तक भी समझ में नहीं आया बीबी पति की केयर को देखती नहीं या उसे वो दिखता नहीं या वो जान बुझ कर अनदेखा करती है… राम जाने। ओशो रजनीश भी कहते हैं औरत को समझना मुश्किल ही नहीं, ना मुमकिन है और हमारी बीबी तो उनकी फॉलोअर है।
खैर यह सच है बीबी ज्यादा, कभी कभी एक्स्ट्रा केयर करती है और पति थोड़ा कम केयर करने को भी एक प्रकार की केयर मानता है। सोचता है वो इंडिपेंडेंट बनेगी, स्ट्रॉन्ग बनेगी वगैरे वगैरे।
विषय भटक रहा है।
अंततः ७.०० बजे एक सहयोगी संतोष उसके बेटे के साथ गणेश घाट पहुंच जाता है। और हम साइकिल ले कर निकल लेते हैं।
सबसे पहले हम साइकिल से हमारे मित्र “दिलीप भाई” के घर पहली बार जाते हैं, उन्हें उनके जन्मदिन की सुबह की सबसे पहली “शुभकामना” देते हैं। भाभी का दिया “दलिया का लड्डू” एवम दिलीप भाई को हुई “खुशी से चार्ज” होकर शिरसोली( पास का एक छोटा गांव) के रास्ते निकल पड़ते हैं।
सुहाना मौसम, हर जगह हरियाली, मजा आता है, मन प्रसन्न हो जाता है। फिर रास्ते में एक बड़ा चढ़ाव आता है। पैडल मारने में दिक्कत आती है, थक जाता हूं, पैर दुखने लग जाते हैं, सांस फूल जाती है, पर रुकता नहीं हूं और फिर अचानक लंबी ढलान आ जाती है। और सफर वाह! क्या सुहाना बन जाता है। बगैर पैडल मारे साइकिल स्पीड पकड़ती है और मैं ठंडी ठंडी हवा को महसूस करता हुआ, उसका लुफ्त उठाता हुआ, उसे चीरता हुआ आगे निकलता रहता हूं।
चढ़ाव, थकान, पैरों में दर्द और उसे पार करते ही ढलान, आराम, शीतल हवा, रफ्तार हिस्से आ जाती है। सोचो तो अपनी लाइफ भी कुछ ऐसेही चलती है। डर के बाद जीत। एक और बात… ढलान, ठंडी हवा, रफ्तार अच्छी तभी लगती है जब हम चढ़ाव को पार करते हैं। वक्त के साथ, हालात के साथ, उम्र के साथ हर चीज का, वस्तु का अनुभव अलग अलग बन जाता है, बनता रहता है। और हम अक्सर आए हुए दो चार अनुभव से इंसान को जज़ करना शुरू कर देते हैं।
रास्ते में एक और सहयोगी “कृष्णा” जुड़ जाता है और हम साइकिलिंग करते करते शिरसोलि तक पहुंच जाते हैं।
शिरसोली में हमारे दो सहयोगी.. ऑल राउंडर “साजिद” और एनिमेटर “संदीप” रहते हैं तो सोचा “क्यों ना उनके घर का दर्शन लिया जाए?” शायद हमारे जाने से उन्हें खुशी हो।
कृष्णा कहता है “आज बकरी ईद भी है।” मैं कहता हूं “चलो साजिद के घर पहली बार बकरी ईद मना लेंगे।” घर पर उसकी मां से मिलते है जिनका पूरा खानदान “पुलिस विभाग” में कार्यरत था और वो भी पूरी “ईमानदारी” के साथ। । निकलते वक्त मैं चूक गया, उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेना रह गया। पर चाय के साथ ईद जरूर मना ली।
“संदीप” के घर गए। उसके परिवार से, छोटे “देवेंद्र” से मिले। वहां से निकलकर सबके साथ वहीं के जानीमानी होटल में नाश्ता किया और लौट पड़े वापसी के रास्ते पर।
रास्ते में बारिश शुरू हो गई जिसकी सही में कमी थी। बारिश कभी हल्की तो कभी थोड़े जोर से पूरे रास्ते शुरू रही। पर साथ में हवा भी चल रही थी, कपड़े गीले भी हो रहे थे और सुख भी रहे थे। साइकिल चलाते चलाते स्कूल के दिन याद आ रहे थे। बचपन में अक्सर ऐसे ही साइकिल पर निकल जाता था घूमने जब पहली बारिश हुआ करती थी।
शुक्र है उपर वाले का.. ४५ वर्ष के बाद भी बारिश का मजा मुझे लेते आया जैसे पहले लिया करता था।
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सच ही कहा है.. जल ही जीवन है और Life है ब्यूटीफुल।
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आनंद मल्हारा
इतवार, १० जुलाई २०२२, जलगांव


