कुछ वर्ष पहले एक दिन मैं फैक्ट्री गया था, हमेशा की तरह शायद गया होगा २०_२५ दिनों बाद। फैक्ट्री में राउंड मारा, सुपरवाइजर से बात हुई, केबिन में आता हूं, कुर्सी पर बैठता हूं और मुझे एक खत दिखता है।
उठाकर देखता हूं तो वो खत किसी लेबर यूनियन की तरफ से आया होता है, लेटर में अनेक मांगे लिखी होती है… ये चाहिए, वो चाहिए और सबसे मजेदार बात उसपर बहुत से कर्मचारियों के हस्ताक्षर भी होते हैं जिसे देखकर मेरा शरीर ढीला पड़ गया।
मैं उसे पढ़ता हूं तो डिस्टर्ब हो जाता हूं। मेरे हिसाब से, इंडस्ट्री के हिसाब से मैं लोगों को अच्छा पगार देता हूं, सुविधाएं देता हूं, उनका खयाल रखता हूं, उन्हें हर वर्ष ट्रिप पर ले जाता हूं, अलग अलग कार्यक्रम भी रखता हु… फिर ये लेटर क्यों?
उदास हो जाता हूं, इतना इमोशनल हो जाता हूं कि तत्काल एक कागज लेता हूं और उसपर कर्मचारियों के लिए एक खत ड्राफ्ट करता हूं, उसमें यही लिखता हूं की मुझे ऐसा लगता है कि तुम यहां खुश नहीं हो और तुम्हें मालिक के बजाय तीसरे व्यक्ति के पास जाना पड़ रहा है अपनी समस्याएं सुलझाने तो मैं खुशी खुशी इस प्रेस को एक महीने बाद बंद कर रहा हूं, ताकि आप फ्री हो सको, धन्यवाद। करीब करीब वैसे ही जैसे हमारे सीएम साब ने दो दिन पहले फेस बुक लाइव में कहा यदि आप नहीं चाहते तो मैं कुर्सी छोड़ने तैयार हूं। वे स्वाभिमानी है, बाय हार्ट आर्टिस्ट, इमोशनल है।
मेरे लिखे लेटर को मैं मेरे एक सहयोगी स्टाफ गजानन को बताता हूं और कहता हूं “पढ़ लो और उसे डिसप्ले बोर्ड पर लगा दो।” वो उसे पढ़ता है, परेशान हो जाता है। और कहता है “भाऊ ऐसा मत करो, सब ठीक हो जायेगा।”
बात वहीं रुक जाती है, मैं भी धीरे धीरे उस निगेटिव विचारों में से बाहर निकलता हूं। लोग भी निकलते हैं,वक्त के साथ कुछ बातें सुलझ जाती है।
पर मैं समज नहीं पाता हुं, ये आखिर क्यों हुआ, कहां मैं गलत रहा? मेरे मैनेजमेंट में क्या कमी रही?
निष्कर्ष यही निकलता है.. #कम्युनिकेशन।
# मेरा कर्मचारियों के साथ का वार्तालाप कम हो गया,
# स्टाफ को लगने लगा हमारा ध्यान देने वाला कोई नहीं है
# जो सीनियर स्टाफ था वे भी अपने काम में लगे रहते। उनका कम्युनिकेशन स्टाफ से काम के प्रति ही रहता। फ्लोर के कर्मचारी उन तक पहुंचते तो भी वो अपने तरीके से जवाब देते पर अंदर ही अंदर असंतोष बढ़ रहा होगा। यदि आदमी अपना दुख, अपनी परेशानी को सिर्फ रोज सोचता ही रहे, उसे कुरेदता ही रहे तो वह एक पहाड़ के माफिक दिखने लगता है और एक दिन उसका स्फोट होना स्वाभाविक हो जाता है।
मुझे लगता है..
# जब आदमी अंदर से परेशान होता है तो समजदार, स्वाभिमानी व्यक्ति उसका हल खुदमें ढूंढता है। खुद को मजबूत बनाता है। और कमजोर किसी बाहर के सहारे को ढूंढता है जो उसकी परेशानी को आसानी से दूर कर दे।
# बाहर भी ऐसी अनेक ताकते होती है, आकर्षण होता है जिनका काम यही होता है.. वे बड़े बड़े सपने दिखाती है, कम मेहनत में ज्यादा मुनाफा बताती है, पैसे डबल करने की बात करती है, समस्या को छू मंतर करने की भाषा बोलती है और अपनी और आकर्षित कर लेती है.. कारण उनकी वही रोजी रोटी होती है और वही काम।। आदमी भी सोचता है चलो ये आसन रास्ते पर चल कर देखते हैं। थोड़े पैसों में फायदा ही फायदा दिख रहा है। लोग उसमें फंस जाते हैं। जब समझ में आता है की यह सब दिखावा है, तब कुछ समजदार उसमें से निकल जाते हैं, कुछ चाहने पर भी निकल नहीं पाते कारण दूसरे ताकतवर उन्हें निकलने नहीं देते।
# मैंने भी हाल में वॉट्सएप पर एक प्रतिष्ठित व्यक्ति की तरफ से आए एक msg को सच मान लिया और उसे मेरे करीबी ३० लोगों तक सहज भेज दिया। कारण मैं भी टाटा की नई गाड़ी मुफ्त में पाना चाहता था। बादमें किसीने मुझे रिप्लाई किया ये फेक मैसेज है, ३ साल से घूम रहा हैं। तब सर को पकड़ लिया।
खैर, तो बात चल रही थी वार्तालाप की, अपने टीम के साथ एकरूप होने की, उन्हें समझने की। जरूरी नहीं उनकी हर समस्या का हमारे पास हल हो, पर सुनना, समझना , समझाना जरूरी है नहीं तो बात बिगड़ते देर नही लगती। जमाना फास्ट हो गया है, इंस्टेंट, तत्काल हो गया है। हमारे सहन करने की क्षमता कम हो गई है और शायद ज्यादा खुदगर्ज भी।
तो मैंने एक पहल की है…अच्छी है, शेयर कर रहा हूं…
मैंने फिर से दोपहर के खाने पर एक सहयोगी कर्मचारी को बुलाना, उससे गप्प लड़ना शुरू कर दिया है। मजा आता है, अच्छा लगता है। कुछ नई बातें शेयर होती है, हम अपने दिल की बात शेयर करते हैं। आपसी दूरियां भी थोड़ी कम होती हैं।
जो आज हम पिछले ४_५ दिनोसे न्यूज में, टीवी में देख रहे हैं। देखकर परेशान हो रहे हैं, अचंभित हो रहे हैं या एंटरटेन हो रहे हैं …मालूम नहीं।
उससे हम यही सिख सकते हैं हम हमारी टीम कैसे हेल्थी बनावे, खुले दिल से एक दूसरे को समाज पाए चाहे वो घर हो, परिवार हो, ऑफिस हो, कंपनी हो या कोई पार्टी हो।
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है ना लाइफ इस changing yet beautiful?
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आनंद मल्हारा
२६ जून २०२२


