मोबाइल का रास्ते पर गिरना भी अच्छा हो सकता है।

मोबाइल का रास्ते पर गिरना भी अच्छा हो सकता है।

  • 81 Views

ताजा ताजा किस्सा है। एक घंटे पुराना किस्सा है। बीबी बंबई गई हुई है, तन्वी के साथ है। तन्वी की सीरियल की चल रही शूटिंग में उसे सपोर्ट करने, उसका ध्यान रखने का नया काम कर रही है। स्कूल में पढ़ाई भी खत्म हो गई है, छुट्टियां लगने को है तो वैसे भी “मैडमजी” रिलैक्स हैं।

घर पर खाना बनाने वाली ताई भी आज छुट्टी पर थी। रात को सोचा आज अपने हाथोंसे जरा “मैगी” बना कर खायेंगे। घर में पड़ा “मैगी” का पैकेट दिखा नहीं तो सोचा चलो जाकर खरीद लाते हैं।

टी शर्ट, पायजामा पहन कर वेस्पा पर बैठ चल निकला मैगी खरीदने। मोबाइल पायजामा की जेब में ठीक से रख दिया।
जलगांव के रास्तों के हालात कुछ ज्यादा ही खराब है। घर के बाहर से लेकर डी मार्ट तक का हमारा सफर कुछ ज्यादा मजेदार होता है। गाड़ी ऊबड़ खाबड़ रास्ते को पार करते निकलती है, शरीर भी, गाड़ी भी हिलते डुलते चलती रहती है।

डी मार्ट, वहां से काव्य रत्नांजली चौक, वहां से महाबल और फिर मोहाडी रोड होते हुए रास्ते में खुली “ओम सुपर शॉप” के पास रुकता हूं, दुकान में जाकर “मैगी” के दो पैकेट खरीदता हूं और कुछ ही देर में घर पहुंच जाता हूं।

किचन के अंदर जाकर “मैगी” का स्वाद बढ़ाने प्याज, टमाटर काट रहा होता हूं तभी बाहर छोटा भाई “प्रशांत” और बहु “मनीषा” दरवाजे पर दस्तक देते हैं। मैं बाहर आता हूं…मनीषा पूछती है, “भैया आपका फोन कहा है?”
मैं कहता हूं “मालूम नहीं, यहीं कहीं होगा, क्यों?” फिर अचानक मेरी बैटरी जलती है, पूछता हूं “क्या हुआ, मेरा मोबाइल कहां गिर गया क्या?”

प्रशांत कहता है “हां.. तेरा मोबाइल “डी मार्ट” के वहां रास्ते पर गिर गया था, वहां से जा रहे एक सज्जन को वो गिरा दिखता है। वो उसे उठा लेता है। फोन चेक करता है। और  तन्वी को फोन करता है, सब स्टोरी बताता है और कहता है “मैं डी मार्ट के पास खड़ा हूं, किसे भेज दें या घर का पता बतावें ताकि मोबाइल आपको सही सलामत दे सकूं।” तन्वी “मम्मी” को किस्सा बताती है, “मैडम” फोन पर ही उस “सज्जन” को धन्यवाद देती है और कहती है आप वहीं रुकें, मैं किसे भेजती हूं, फिर मैडमजी मनीषा को फोन करती है, और हम दोनों डी मार्ट जाकर उससे फोन लेकर जस्ट अभी  तुझे देने आ रहे हैं।”

यह सब सुनकर हम सब हंसने लग जाते हैं। सहज मुंह में से निकलता है…
साला फोन “लकी” दिख रहा है।फोन गिर भी गया, भर यातायात वाले रास्ते में सही सलामत रहा, किसे मिल भी गया और मुझे मालूम पड़ने के पहले मेरे हाथ में फिर से आ गया। जैसे कोई “गिफ्ट” हो।

मैंने तुरंत उस सज्जन युवक को फोन लगाया। उसे धन्यवाद दिया,  कहा “यार तुमने तो मुझे एक बड़ा गिफ्ट दे दिया। पिछले सप्ताह ही खरीदा था इसे।” उस सज्जन ने सहजता से कहा “ऐसी कोई बात नहीं, आपका फोन था, आपके पास पहुंचा कर हमें भी खुशी हो रही है।”

उस सिंधी समाज के युवा सज्जन  का नाम है “देवेश कटारिया” जिनकी “न्यू अप्सरा रेडीमेड” के नाम की फूले मार्केट में दुकान है। “धन्यवाद देवेशजी।”

तुरंत बीबी का फोन आता है, गुस्सा करती है, कहती है “जरा ध्यान से काम करा करो, क्यों इतनी घाई करते हो।” मैंने कहा “भागवान.. इस उम्र में कुछ भूल जाना, कहां गिरा देना नेचुरल है.. आगे भी होगा.. टेंशन मत लो।”
“और देखो.. तुमने कभी सोचा था कोई तुम्हारा गुम हुआ मोबाइल तुम्हें वापस लाकर देगा? है ना दुनियां में अच्छे लोग, सच्चे लोग?”

वो बोल उठी “सच में दुनियां में अच्छे लोग भी होते हैं।  मैंने फिर कहा “अरे भाई दुनियां में लोग अच्छे ही होते हैं, केवल कुछ लोग गलत होते हैं, गलत काम करते हैं और हम उन्हें देखकर, उन्हें सुनकर दुनिया को गलत मान लेते हैं..अच्छाई पर भरोसा करना छोड़ देते हैं।”
मैडमजी को भी मेरी बात थोड़ी जमी।

तो बोलो… हुआ ना “मोबाइल का खोना” एक “अच्छी” बात।
इसी बहाने किसी को इंसानियत दिखाते आई, तो किसीका इंसानियत पर भरोसा बढ़ा, तो मेरे जैसे को बीबी की वार्निंग और बिन मांगे जैसे तोहफा मिल गया साथमें मेरा “मोबाइल लकी” है का एक एहसास दिलाया।

***

है ना लाइफ इस सिंपली ब्यूटीफुल।

***
आनंद मल्हारा
रात्रि १०.३०,
रविवार, ८/५/२०२, जलगांव।