हां ना हां ना हां करते कब गाड़ी छूट गई पता ही नहीं चला।

हां ना हां ना हां करते कब गाड़ी छूट गई पता ही नहीं चला।

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किस्सा थोड़ा पुराना है पर मजेदार है। तन्वी का nsd नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, सिक्किम में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा के लिए सिलेक्शन होता है। नामुमकिन लगने वाला सिलेक्शन होने स घर में पार्टी होती है। कारण भी था.. हजारों बच्चों में से तन्वी का वो भी ओपन कैटेगरी में सिलेक्शन जो हुआ था। जबकि एक्टिंग का घर में कोई बैकग्राउंड नहीं था। Corona के कारण पिछले वर्ष कॉलेज में एडमिशन की प्रोसेस ही नहीं हुई , इस वर्ष इंटरव्यू के लिए डबल की तादात में स्टूडेंट्स आए थे।

खुशी खुशी कॉलेज में एडमिशन ले लिया, उनका कॉन्ट्रैक्ट साइन किया। इस विशेष डिप्लोमा में गवर्नमेंट बच्चों से कोई फीस लेती नहीं है बल्कि उन्हें स्टाइपेंड देती है। पर उनसे लिखवा कर लेती है कि एक साल तुम केवल कॉलेज के प्रोजेक्ट्स, पढ़ाई पर ध्यान दोगे। कॉलेज के अलावा कोई भी बाहर का काम कर नहीं सकते। ना ही कोई छुट्टी मिलेगी।

कॉलेज शुरू हुए, पहले एक महीना ऑनलाइन चला। थिएटर का इतिहास पढ़ा।फिर कॉलेज से ऑफलाइन शुरू होने का संदेश आया। सिक्किम जाने के टिकट बुक हुए। जाने की तारीख जैसे ही पास में आई तभी तन्वी को एक वेब सीरीज में “सेकंड लीड रोल” के लिए ऑफर आई जिसकी तन्वी ने पहले ऑडिशन दी थी । पैसे भी अच्छे थे। सोच में पड़ गए, अब क्या करें?

घर में मेरा, और बहुतों का मत “nsd में जाना चाहिए” था। लगता था.. वहां जायेगी, एक्टिंग सही तरीके से, बारीकी से सीखेगी, काम तो जिंदगी भर करना ही है पर पहले पढ़ाई। पर तन्वी की इच्छा कुछ कम ही थी। उसे लग रहा था की यह मेरा हाई टाइम है इंडस्ट्री में रहने का, इंस्टाग्राम पर फॉलोवर्स को बढ़ाने का, दो पैसे कमाने का। एक साल यदि में सिक्किम जाती हूं तो में इंडस्ट्री से अलग हो जाऊंगी, कट जाऊंगी। एक साल बाद फिर से मुझे स्ट्रगल करना पड़ेगा। पर वो मेरा कहना टाल नहीं पा रही थी।

मैंने फिल्म इंडस्ट्री में से कुछ परिचित लोगों से राय मांगी, सबने यही कहा nsd अच्छा प्रपोजल है। तन्वी को Nsd का लेबल लग जायेगा।

तन्वी अंदर से परेशान, हमे कुछ समज में नहीं आ रहा था। सुबह मुझे “हां” कहती फिर
दिन में मां के सामने रोती, फिर मैडम मुझे फोन करती, कहती “क्यों बच्चों को उनकी इच्छा के खिलाफ भेज रहे हो। उसे नहीं जाना है।” मैं घर आता..तन्वी को कहता “ठीक है तुझे जो निर्णय लेना है ले ले, मैं तेरे साथ हूं। Nsd जा या वेब सीरीज कर.. तेरी मर्जी।” पर अंत तक वो निर्णय नहीं ले पाई। सही था कारण दोनों प्रपोजल अच्छे थे, रिजेक्ट करने जैसा कुछ भी नहीं था।

अंत में हमने nsd को फाइनल किया। वेब सीरीज वाले को फोन करके कहा कि “nsd में एडमिशन हो गया है तो अब वेब सीरीज नहीं कर पाएंगे।” वे नाराज हो गए। फिरभी उन्होंने एक दिन और सोचने का मौका दिया। समझाया यह अच्छा ब्रेक है तन्वी के लिए। दूसरे दिन भी हमने वही न की बात दोहराई तो उन्होंने राइटिंग में लेटर मंगाया , हमने लिखकर भेज दिया। थोड़ा हल्का फील हुआ, कारण निर्णय ले लिया था।

दूसरे दिन रात को छोटे भाई “प्रशांत” के यहां बेटे “चारुदत्त” के जन्मदिन के उपलक्ष खाना था। घर के सभी सदस्य साथ थे। फिर से “तन्वी” की बात निकली। जब उस विषय पर फिर से मंथन हुआ तो ज्यादातर सदस्यों ने कहा “वेब सीरीज” करना ज्यादा अच्छा प्रोपोजल है। एक्टिंग काम करते करते भी सीखी जा सकती है। और जो पैसे मिलेंगे उससे कल इच्छा हुई तो परदेस में जाकर भी पढ़ाई कर सकते हो। 

मैं भी कनविंस हो गया। सोचा तन्वी का nsd में सिलेक्शन हुआ है इसका मतलब उसमें पोटेंशियल है। nsd के बच्चों इतना कैलीबर भी है। अब वो कॉलेज में रूटीन पढ़ाई करे या खुले आसमान में अनुभव के साथ खुद की कला को निखारते चले क्या फर्क पड़ता है? तुरंत कास्टिंग एजेंसी को फोन कर के कहा की “हमने इरादा बदल लिया है, हम वेब सीरीज में काम करने तैयार है। Nsd को कैंसल किया है।” उसने कहा “अच्छी बात है, में डायरेक्टर से बात करके कल बताता हुं।” हमने सिक्किम के टिकट कैंसल कर दिए। दूसरे दिन हमने फोन की राह देखी। फोन नहीं आए, हमने लगाया तो उन्होंने कहा आज बात हो नहीं पाई। कल बताता हूं। दूसरे दिन उनका फोन आता है और वो कहते हैं कि “आपने मना किया तो डायरेक्टर ने उनकी पसंद की दूसरी एक्ट्रेस को फाइनल कर दिया है।” हम कुछ बोल नहीं पाए। सोचा चलो अच्छे के लिए हुआ होगा…तन्वी के लिए शायद सिक्किम ही सही मार्ग है।

उधर सिक्किम से फोन आता है और वहां की एडमिनिस्ट्रेटर तन्वी को खूब डांटती है। कहती है “तन्वी तुम ने अभी तक रिपोर्टिंग भी नहीं की और ना ही फोन किया, कितनी केयरलेस गर्ल हो। दो दिन में पहुंचो नहीं तो दिल्ली बात करनी पड़ेगी और दूसरे वेटिंग लिस्ट वाले कैंडिडेट को बुलाना पड़ेगा।” तन्वी रो देती है। कहती है हां आ रही हूं।
पर तन्वी की इच्छा कम ही थी।

मैंने nsd  के सिलेबस की तहकीकात की। कोर्स में पहले 4 महीने एक्टिंग सिखाते है, फिर 4 महीने बैक स्टेज वर्क और बचे 4 महीने अलग अलग एरिया में जाकर रिसर्च करना और एक प्रेजेंटेशन तयार करना होता है। मैंने तन्वी को कहा “तन्वी एडमिशन मिला है, क्यों न 4 महीने वहां जाकर एक्टिंग सिख कर वापस आ जा, कॉलेज का जो भी फाइन होगा, भर देंगे। पर मौके का फायदा उठा ले। मैंने तन्वी को ही निर्णय लेने को कहा।

दूसरे दिन तन्वी कहती है, “पापा चलो ठीक है, मैं वहां एक्टिंग सीखने जाती हूं और 4 महीने में वापस आ जाती हूं तो मेरा नाम खराब होगा। काम को बिचमें से छोड़ना मेरे लिए बहुत मुश्किल होगा। एक और बात मेरे ऐसे करने से एक महत्व पूर्ण सीट का अपमान होगा। यदि दूसरा कोई उस कोर्स को करता है तो वो उसे पूरा करेगा और सभी बाते सीखेगा। मेरे छोटे स्वार्थ के लिए nsd की एक मूल्यवान सीट वेस्ट करना क्या ठीक रहेगा पापा?

मैंने तुरंत कहा “यदि तू सचमुच ऐसा सोचती है तो फिर तेरा एडमिशन कैंसल ही करना उचित होगा। किसी दूसरे को सीखने को तो मिलेगा।” तुरंत सिक्किम फोन करते हैं और एडमिशन को कैंसल कर देते हैं।

अब तन्वी खुश हो जाती है। मैं तन्वी को कहता हूं “अब खुद से पढ़ना है, छोटे छोटे वर्क शॉप करके एक्टिंग सीखना है। साथ में ऑडिशन देते रहना है। कठिन रास्ता है, पर चलना है और इस रास्ते को एक दिन सही साबित कर के बताना है।

वो भी हंसकर, फिर गर्दन झुका कर “हां” करती है। शायद अंदर ही अंदर उसे nsd को मना करने का दर्द तकलीफ दे रहा हो।

आपको क्या लगता है कौनसा रास्ता सही था? या फिर जो रास्ता चुनते हैं उसे सही साबित करना ही जीवन है?

है ना लाइफ इस फुल ऑफ uncertainty, confusion yet is ब्यूटीफुल।

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आनंद मल्हारा
30अप्रैल 22, जलगांव