कोरा कागज़ कोरा ही रह गया।पर चेहरे पर एक अभिमान दे गया।

कोरा कागज़ कोरा ही रह गया।
पर चेहरे पर एक अभिमान दे गया।

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१५ अगस्त…स्वतंत्रता दिवस कैसे सेलिब्रेट करें इसपर ऑफिस में बहस शुरू थी। ३५ वर्षों से अलग अलग क्षेत्र के सम्माननीय गेस्ट को ऑफिस या फैक्ट्री में बुलाना, उनके विचार सुनना, तिरंगा फहराना, राष्ट्रगीत के साथ कुछ देश भक्ति के गीत गाना, नाश्ता करना, वक्त रहा तो क्रिकेट आदि की मैच खेलना या मेहरून तालाब की सफाई या कहीं झाड़ लगाना रूटीन था।

“क्यों ना हम इस वर्ष किसी एक सड़क में उभरे खड्डों को मिट्टी ( मुरूम) से भर दें?” शाम बोल उठा। “इसके कारण कुछ बदल दिखेगा। जनता को कुछ धक्के कम लगेंगे और शायद कुछ दुर्घटना भी टलें।” शाम ने आइडिया के फायदे बताएं।
उसे सुनतेही सबने कहा “बेस्ट।” कारण स्पष्ट था, आइडिया अच्छी है, नई है, और जलगांव शहर की आज की जरूरत भी।

( हमारे जलगांव में करीब दो ढाई सालों से अमृत योजना का कार्य धीमी गतीसे चल रहा है। ड्रेनेज, ड्रिंकिंग वाटर की पाइप लाइन अंडरग्राउंड डाली जा रही है। इस कारण शहर के रास्तों के हाल बेहाल है। जो रास्ते पक्के हैं तो उसमें अनेकों खड्डे उभर आए हैं। निश्चित इन रास्तों ने अनेकों को कमर का दर्द दिया होगा या कहो अनेक डॉक्टरों का, मैकेनिक्स का, शॉकअप्स कंपनियों का बिजनेस बढ़ाया होगा। पर हम जलगांव वासियों को आशा है, विश्वास भी है.. जल्द ही जलगांव के रास्ते हवाई पट्टी के माफिक चमकने लगेंगे )

उस आइडिया पर चर्चा चली, कलेक्टर बंगलो से लेकर रामानंद चौराहा तक के रास्ते का चयन हुआ। सुबह ७.३० से काम शुरू करेंगे। साथ में एक गाड़ी रहेगी जिसमें देशभक्ति के गाने चलेंगे। साथी हाथ बटाना, एक अगर थक जाए तो मिलकर हाथ बटाना जैसे गाने बजेंगे ताकि किसी औरको इस काम में हाथ बटाना हो तो वो बे झिझक आए।चर्चा में एक और खास बात रखी गई, नो “पोस्टर बाजी” ना ही किसीका नाम। केवल तिरंगा। नहीं तो लोग कहेंगे “चमको गिरी” कर रहे हैं।

निर्णय तो हो गया पर इसे कैसे अमल में लाएं? हमें कहां इस काम का तजुर्बा? हमारे दोस्त “तेजा” को पूछा, उन्होंने कहा “मुरूम डालो और उसके उपर रोलर घुमाओ। पर एक दिन में और छुट्टी के चक्कर में रोलर अरेंज नहीं हो रहा था तो किसीने बताया आप खड्डे में खड़ी डालो, उसे रोलर की जरूरत नहीं पड़ेगी। हमारे मित्र dr अग्रवालजी को खड़ी के बारे में पूछा तो वे बोले केवल खड़ी नहीं चलेगी। उससे तो दुर्घटना के चांस बढ़ेंगे। मुरूम ही डालो और उसे पैरों से लेवल कर दो। आने जाने वाली गाड़ियां उसे प्रेस कर देगी। बात ठीक लगी।

मुरूम फाइनल कर दिया। पर मुरूम मिलना इतना आसान नहीं रहा है आज जलगांव में। अब बगैर परमिट के मुरूम नहीं ला सकते.. व्यापारी बता रहे थे।
मैंने अग्रवलजी को ही कहा आप ही अरेंज करवा कर दो मुरूम। उन्होंने उसे अरेंज करवाया और उस मुरूम को नियोजित रास्ते पर थोड़ी थोड़ी दूरी पर डलवा दिया ताकि काम करने में ज्यादा मेहनत ना हो।

आज १५ अगस्त को सुबह ६.०० बजे नींद खुली। खिड़की के बाहर झांका तो देखा हल्की बारिश शुरू थी। सोचा अब क्या करेंगे? फिर से अग्रवालजी को फोन किया। उन्होंने कहा इस बारिश में काम कर सकते हैं। मैं थोड़ा निश्चिंत हुआ।

प्लान के मुताबिक मैं सुबह ७.०० बजे काव्य रत्नांजलि चौक पहुंच गया। मेरे पहले ही शरद मौजूद था वहां। एक एक करते हमारे सहयोगी ७.३० तक और बचे हुए ८.०० बजे तक पहुंच गए। डॉक्टर अग्रवालजी भी आ गए थे। हमेशा की तरह गाड़ी भी ७.०० की जगह ७.३० को ही पहुंची जिसमें घमेली, फावड़ा, पानी के जार,आदि सामान था। गाड़ी के आगे तिरंगा लगा था और उसमें गाने बज रहे थे। मेरा अंदाजा सही था। २५ से ३०% लोग ही आए थे, कारण ऐसा प्रोजेक्ट हर एक को पसंद आना भी संभव नहीं। फिर भी २०_२५ मेंबर हो गए थे। इस प्रोजेक्ट के लिए काफी थे।

५_५ की टीम बनाई। दो लोग घमैली में मुरूम भरकर देंगे और दो लोग उसे खड्डे में डालेंगे और एक उसे पैर से लेवल करेगा।
४ टीम बन गई और काम का श्री गणेशा हो गया। हर कोई दिल से काम कर रहा था, फिर वो २१ साल का युवा हो या ६० साल का सीनियर सिटीजन। महिला मेंबर भी कार्य में अपना सहभाग दे रही थी। रास्ते पर आते जाते लोग रुक रहे थे, देख रहे थे और उन्हें देख टीम का जोश बढ़ रहा था। देखते देखते ९० मिनिट में ६०% काम पूरा हुआ और बारिश ने जोर पकड़ लिया। पूरी टीम पानी में भीग चुकी थी, भीग रही थी और मजेसे काम भी कर रही थी।

डॉक्टरसाब बोले “थोड़ा रुक जाते हैं। कही कोई बीमार हो गया तो और परेशानी होगी।” टीम थोडी थक भी गई थी। रुक गए। पास के मार्केट की गैलरी में जमा हो गए। वहीं नियोजित नाश्ता आ गया। सोमवार था तो गरम गरम साबूदाना वडा, केले मंगाए थे।
हमारे आजके गेस्ट तथा मित्र श्री पारुलेकर सर भी पहुंच चुके थे। सबका नाश्ता हो चुका था।

१५ अगस्त का फॉर्मल प्रोग्राम करने रास्ते पर ही जगह ढूंढ रहे थे तो वहां चर्च दिखी। चर्च के पोर्च में प्रोग्राम करने का डिसाइड हुआ। बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी। हम सब चर्च के पोर्च में आ गए। चर्च के फादर बाहर आए और उन्होंने हमारा हंसकर स्वागत किया। हमने उन्हें कहा यहां छोटा सा प्रोग्राम करना है तो वे बोले “जरूर जरूर, मैं ऑफिस में तुम्हें सीसीटीवी पर रास्ते पर काम करते देख रहा था, देखो, बारिश शुरू है तो आपके लिए हम चाय बनाते हैं, प्लीज पीकर जाइए।” सुनकर सभी को प्रसन्नता हुई। हमने भी हामी भर दी कारण हमारा नाश्ता हुआ था पर उसमें चाय नहीं थी।

पोर्च में गार्डन था, येशु की मूर्ति थी। हमने राष्ट्रगीत के बजाय “भारत मेरा देश है” की प्रतिज्ञा दोहराई जो हम बचपन में स्कूल में रोजाना लेते थे। गाड़ी पर तिरंगा लहरा रहा था। कुछ मैं बोला, थोड़ा अग्रवालजी, फादर भी बोले कहा “मैं खुद आपके इस कामसे प्रभावित हुआ हूं। रोज खड्डे मैं भी देखता था पर उसमें मिट्टी नहीं डाल पाया।”
पारुलेकर सर ने भी इस कार्य का हिस्सा बनने की खुशी जाहिर की। अंत में फादर ने सबको प्यार से चाय पिलाई। अपने नाम को सार्थ किया।

गेट के बाहर आकर देखा। बारिश शुरू थी। हर जगह पानी जमा था। बहुत सा मुरूम बह गया था। फिर से खड्डे दिख रहे थे। गाड़ियां, ऑटो, टू व्हीलर आ जा रहे थे। खड्डों में गाड़ियां उछल रही थी।
लग रहा था जैसे “कोरा कागज कोरा ही रह गया।”

पर फिर भी इस प्रोजेक्ट ने, इस पहल ने बहुत कुछ दिया। एक सकारात्मक फुल टू एक्शन एक्टिविटी करने का मौका दिया।
जो काम मजदूर करते हैं उसे जीने का, महसूस करने का मौका मिला। फादर की प्यार से बनाई चाय पीने को मिली। पारुलेकर सर और अग्रवालजी का साथ मिला।

और सबसे खास बात बिदा होते वक्त पूरे टीम के चेहरे पर सुंदर सी मुस्कराहट, समाधान और अपने गांव के लिए कुछ करने का अभिमान था।


है ना लाइफ इस ब्यूटीफुल।


आनंद मल्हारा
१५ अगस्त २२, जलगांव।