बनारसी पान, लिटी चोखा औरथोड़ी “बनारसी आव भगत के बारे में!”

बनारसी पान, लिटी चोखा और
थोड़ी “बनारसी आव भगत के बारे में!”

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वै सेभी अब “सठिया” गए हैं तो इधर उधर घूमना शुरू किए हैं। कुछ महीने पहले हम दोनों हैदराबाद गए थे “बिरयानी” खाने। दोस्तों ने पूछा बिरयानी तो नॉन वेज होती है पर हमने समझाया हैदराबाद में स्वाद भरी “वेज बिरयानी” भी मिलती है। पर हमें बिरयानी, कराची बिस्किट, फालूदा, ईरानी चाय से भी अच्छी लगी वो “मेहमूद” वाली “हैदराबादी हिंदी” भाषा। “हैदराबादी लहेजा” और हमारे दोस्त “हिंदी मिलाप” के “प्रकाश जैनजी” की मेहमान नवाजी।


फिर से थोड़ा टाइम निकाला और बीबी बच्चों के साथ बनारस निकल पड़े। बीबी की विशेष ख्वाइश थी। उन्होंने किसी से “लिटी चोखा” के बारेमें सुना था। मैंने भी “गंगा नदी”और उसके अलग अलग “घाट” के साथ “बनारसी पान, बनारसी कचौड़ी चाट, पहलवान लस्सी और ठंडाई” के बारे में भी सुना था।

बच्चों को भी “मस्का” लगाना पड़ता है साथ आने के लिए। सही भी है एक बार बच्चे बड़े हो गए कि सबकी अलग अलग अपनी “प्रायोरिटी बन जाती है। तनयने “ना” कर दी पढ़ाई के लिए। “तन्नू” तयार हो गई इस बात पर की वहां अच्छे फोटोज क्लिक कर सकेगी, इंस्टा के लिए इंटरेस्टिंग रील्स बना सकेगी उपर से होटल भी अच्छी है तो आराम भी हो जायेगा। बड़ी बेटी “सिरिन” अपने बेटे ३ साल के “राजसके” साथ आने को राजी हो गई, यही सोचकर की राजस “नाना नानी” के साथ ज्यादा gel हो सके। और वैसेभी बचपन कहो या १० वी के बाद सिरीन हमारे साथ ज्यादा घुम नहीं पाई। पहले अमेरिका चली गई, आनेपर १२ th की पढ़ाई, फिर मुंबई का ४ साल की डिग्री फिर और २ साल का मास्टर्स और थोड़ी इंटर्नशिप और उसका पूरा होते ही फटाफट “शादी”कारण वो “२६” पार कर चुकी थी…. थी ना वो हमारी टिपिकल “मारवाड़ी सोच”।

बनारस में “टूक टूक” में बैठ होटल पहुंचे। “Stay banaras” छोटी थी पर cute थी। मालिक ने अपने घर को होटल में तबदील कर दिया था। स्पेस का सही यूज, प्लांटर्स का सही प्लेसिंग, येलो व्हाइट की कलर स्कीम, सुंदर गार्डन रेस्टोरेंट सब कुछ अच्छा था। तनवी ने पूछा “जिम कहां है?” तब मालूम पड़ा होटल में जिम नहीं है। सुन कर तन्नू भड़क उठी, गुस्सा हो गई, चिल्ला कर बोली “पापा, आपने तो कहा था बनारस चल, वहां मस्त जिम करना, कहां है जिम?” “आप ऐसा कैसे कर सकते हो मेरे साथ ?” I don’t want to stay here”. मुझे लगा था इतना टैरिफ है तो जिम होगी ही। मैंने तन्नू को कहा “शांत हो जा, मैं जिम की व्यवस्था कर दूंगा”। मैनेजर को बोला “तुम्हारे करीब कौनसी जिम है तलाश करो और उनसे बात तुरंत बात करो , तनवी वहां जिम करने जायेगी”। बिचारे मैनेजर ने पड़ोस के एक जिम में तनवी की व्यवस्था करा दी। दूसरे दिन जब सुबह वहां गए तो जिम का रंग रूप देखकर तनवी ने “ना” कर दी और पड़ोस के एक बड़े पब्लिक गार्डन में रनिंग करना पसंद किया।

उस दिन जब होटल वालों को तनवी के achivements के बारे में मालूम पड़ा तो उन्होंने रात को पूरे परिवार को उनकी तरफ से खाने की विशेष दावत दी जिसे सबने बहुत एंजॉय की।

बनारस में हमारे एक परिचित थे। हमारी मैडम के “अनुभूति स्कूल” के सहयोगी “अभिनव सर” का घर और ससुराल दोनों बनारस में ही है। और उनकी श्रीमतीजी कुछ ही दिन पहले बनारस आई थी जो हमारी मैडम की अच्छी दोस्त भी थी। हमारे बनारस पहुंचने के पहले उनका मैडम को फोन आ जाता है। शाम को वे अपने भाई के साथ होटल आ जाती हैं हमें “अस्सी घाट” ले जाते हैं, गंगा के अस्सी घाट पर हो रही “विशाल आरती” बताते हैं। घाट पर ही “कुल्हड़” में मस्त गरमा गरम “चाय” पिलवाते हैं। अन्त में एक फेमस रेस्टोरेंट में हम “लिटी चोखा” खाते हैं।

* क्रमशः*