दूसरे दिन सुबह फिर वे गरम गरम बनारसी फेमस नाश्ता लेकर आ जाते हैं…”गरमा गरम पूड़ी कचौड़ी और जलेबी”।
और हमें कहते हैं ” कल होटल चेक आउट कर आप हमारे घर आ जाओ”। हा ना.. हा ना करते अंत में हम पहुंच जाते हैं अभिनव सर के “ससुरालमें”। उनकी श्रीमतिजी “अंजनाजी” के बड़े घर में। पुश्तैनी बड़ी जमीन, दो गाए। जहां बनी थी उनकी उत्सव वाटिका।
चाय, नाश्ता और रात को बड़े प्रेम से उन्हों ने घर पर “बाटी चोखा” बनाई। अभिनव सर के “सास ससुरजीने” अपने हाथों से “तगारीमें” “कंडे” जलाकर बाटी बनाई। यहां की विशेष बाटी के अंदर सत्तू एवम मसाला भरा जाता है। और आलू, बैंगन, प्याज, टमाटर आदि को भूनकर उसे मसाले का छौंक लगाकर बनता है स्वादिष्ट चोखा। जैसे हमारे यहां खानदेश में बनता है “बैंगन भरता”। यहां बाटी के साथ “दाल” नहीं तो यह “चोखा” खाया जाता है। साथमें टमाटर प्याज की चटनी होती है। और अंत में दूध की खीर। हम सब बड़े चाव से उसे खाते हैं। खाते खाते उसका स्वाद और साथमें उनकी “भोजपुरी भाषा” हम सबके दिल में बस जाती है।
फिर से सुबह वे घुमाने ले जाते हैं। उनकी स्कूल, उनके भाई का कोचिंग, उनका बन रहे नया डुप्लेक्स घर सब बताती है। वे खुद कहती हैं “हमारे पास जायदात तो अमीरों जैसी है पर हम रहते हैं एकदम सामान्य वर्गो जैसे”। कोई फैंसी चीज़ घरमे नहीं। और कोई बदलने को तैयार भी नहीं। वो एक “खुली किताब” की तरह बताती है… , उनके जीवन शैली के बारे में, उनकी छोटी छोटी खुशी के बारे में, परिवारों के बारे में, बेटी और बेटों के बीच प्रॉपर्टी के बटवारे के बारेमें।
रात को हमारी मैडम कहती है “इन्होंने हमारे लिए इतना कुछ किया, कितना समय दिया, घर पर रुकाया, कितनी आव भगत की सच में तारीफे काबिल है। कल हम जब घूमने जायेंगे तब उनके लिए एक अच्छासा तोहफा खरीदेंगे “। बच्चों ने भी हामी भरी। हम आखिरी दिन मार्केट गए, हर एक के लिए कपड़े खरीदे, उनके बेटे के लिए सॉफ्ट टॉय, उनके छोटे भाई के लिए “केक” खरीदा जिसका जन्मदिन दूसरे दिन था।
गिफ्ट खरीदने के बाद थोड़ा अच्छा लगा।थोड़ा हल्कापन लगा। सोचते हैं तो बुरा भी लगता है, आज हम इतने व्यवहारिक हो गए हैं कि हर किसी चीज को, घटना को, पलों को हम मापने तौलने लग जाते हैं।
खैर…अब हमारे जाने का वक्त हो जाता है, “अंजनाजी” दो वक्त का टिफिन पैक करके देती है। दिया हुआ “केक” भी लेकर आती है और एडवांस में छोटे २२ वर्षीय भाई “दीपक” का “जन्मदिन” सब मिलकर सेलिब्रेट करते हैं। वो पूछती है दीपक से “कितने साल बाद “केक” कट कर रहे हो” तो वो भी उतनीही सहजता से कहता है “१० साल बाद”। मां बेटे को, बेटा मां को , बहन भाई को, भाई बहन को केक खिलाते हैं । सब के चेहरे खुशी से खिल उठते हैं। लिखते वक्त मुझे अहसास होता है हम उनके पिताजी को नीचे बुलाना भूल गए थे।
उनकी मां जब नीचे आई थी उनके हाथों में अलग अलग थैलियां थी। एक में था हमारी मैडम के लिए ड्रेस का कपड़ा और दूसरे में मेरे लिया कुर्ता धोती और टोपी.. पूरा सेट! तनवी को पैसे, सीरीन, राजस को पैसे। इतना फिर से उन्होंने दे दिया। उनके आग्रह, उनके प्रेम के आगे हमारी मैडम की ना ना कमजोर गिर गई। उसे सब स्वीकार करना पड़ा।
हम फिर से उनके मान सम्मान के सामने छोटा फील करने लगे। उनका बड़ा दिल, उनकी आव भगत , उनका भाईचारा हमारे उपर फिर से भारी हो गई। लगा जैसे “यूपी” फिर से जीत गया।
पर हम हारकर भी “बनारसट्रीप” को जीत गए। साथमें “मेहमान नवाजी” की नई ऊर्जा लेकर हम सब अपने घर लौट चले।
है ना लाइफ इस ब्यूटीफुल n full of love।
आनंद मल्हारा
१७/१०/२२


