परसों का ही किस्सा है, सुबह सुबह मालेगांव गया था Dr ठाकरे जी के बन रहे नए हॉस्पिटल में लगने वाले Infotainment art के सिलसिले में।
काम पूरा हुआ तो निकलते वक्त हमारे परम मित्र,शुभचिंतक एमबी के विजय भाई के ऑफिस में झांक कर देखा, सब लोग खाना खाने गए थे । तो निकल पड़ा कारण फोन करूंगा तो अटक जाऊंगा, खाना खिलाएं बगैर जाने नहीं देंगे पर जलगांव जल्दी पहुंचना ज्यादा जरूरी था, सीजन का काफी काम पेंडिंग पड़ा था।
हमेशा की तरह जलगांव के लिए वही बस स्टैंड वाला रोड पकड़ा। शायद उसे आगरा रोड कहते हैं। रास्ते के दोनों और ज्यादातर मुस्लिम बस्ती थी। पिछले ३० सालों से मालेगांव आ रहा हूं , शायद ही आज तक कभी वो रास्ता सही सलामत मिला हो। आज फिरभी मैंने गाड़ी में बैठने के बाद हमारे मित्र दीपक भाई को फोन लगाकर पूछने की कोशिश की… कि कौनसे रास्ते से हाईवे तक पहुंचे? उनका फोन लगा नहीं । जब रिप्लाई आया तब तक आधा रास्ता पार कर चुके थे। हम उसी रास्ते पर अग्रेसर थे जिसे उन्होंने साफ मना किया था।
सोचा.. जो होगा वो देखा जायेगा, खराब रास्ते की थोड़ी तकलीफ सहन कर लेंगे और क्या? थोड़ा आगे पहुंचते हैं ..तो आगे “जाम” दिखाई देता है। गाड़ी रोकनी नहीं बंद करनी पड़ती है। ड्राइवर “साजिद” गाड़ी से उतर कर देखता है, कुछ देर बाद अंदर आकर मुझे कहता है “कुछ मीडिया वाले रास्ते का शूटिंग कर रहे हैं, फोटो शोटो निकाल रहे है”। मैंने भी सोचा शायद टीवी रिपोर्टर आए होंगे और रास्ते की सचाई पर, उसकी दुर्दशा पर अपनी स्टोरी बना रहे होंगे। राह देखते देखते और १०_१५ मिनिट् निकल गए, जाम बढ़ता गया। आगे निकलने की कोशिश में कुछ लोगों ने गाड़ी रोंग साइड में डालकर रास्ते को और jam कर दिया।
फिर “मैं” नीचे उतरा, क्या माजरा है जानने की कोशिश की। आगे जाकर देखा तो वहां कुछ लोग रास्ते के बीचों बीच धरना देकर बैठे थे। रास्ते की दुर्दशा से तंग आकर शायद उन्हें रास्ते पर उतरना पड़ा था। धरना के मुखियाजी कुर्सी पर और बाकि के कुछ रास्ते पर मस्त बैठे थे तो कोई खड़े खड़े माईक पर बुलंद आवाज में नारे लगा रहा था तो बाकी उसे दोहरा रहे थे।। शहर के कमीशनर पर शासन पर नाराजी जता रहे थे। रास्ता सचमुच बेहद खराब था। मेन रास्ते में ७_८ इंच गहराई के बड़े खड्डे जगह जगह थे। या कहो वो रास्ता बिल्कुल अपने जलगांव के “डी मार्ट से इच्छादेवी” तक का जैसा है वैसा था।
कुछ देर में समझ आया कि मुखिया वहां के आमदार “श्री मुफ्ती सय्यदजी”थे जो रास्ते की दुर्दशा के लिए रास्ते पर उतर आए थे। धरने की खबर से पुलिस भी वहां पहुंच चुकी थी और सबके सामने नारे बाजी शुरू थी। ऐलान कर रहे थे “जब तक रास्ते का काम शुरू नहीं होता हम नहीं उठेंगे.. अब चाहे लाठी चलाओ या चलाओ गोली”।
मैं भी वहां खड़ा हो गया, देख रहा था वो धरना। अलग अलग रिपोर्टर आए रहे थे जिसे मुखिया जी अपना बयान दे रहे थे, रास्ते की हालत पर तुरंत एक्शन की मांग कर रहे थे। १५_२० मिनिट तक देख रहा था। सोचा अब उठेंगे, तब उठेंगे । पर उनके उठनेके आसार नजर नहीं आ रहे थे और रास्ते पर ट्रेफिक का जाम बढ़ रहा था। सोचने लगा “क्यों न मैं उनसे बिनती करू कि आप प्लीज अब रास्ते से उठ जाइए, ताकि अटका हुआ ट्रेफिक क्लियर हो सके… करीब एक घंटा हो गया है। आप आम जनता के लिए ही काम कर रहे हो, आम जनता के लिए ही रास्ते पर उतरे हो पर थोड़ा हमारे और भी देखो, रास्ते में अटकी आम जनता परेशान हो रही है, एसटी की अनेक बसेस अटक गई है, अंदर बैठे लोग परेशान हो रहे हैं। ऑटो वाले, कार वाले, ट्रक सभी ट्रेफिक में अटके पड़े हैं, और हो सकता उसमे कोई पेशेंट हो , किसी बच्चे की परीक्षा हो…
लेकिन बोलने की हिम्मत नहीं हो रही थी। कारण सामने १५०_२०० लोगों का जोश भरा समुह, उनकी चल रही नारेबाजी, लाउड स्पीकर पर कभी कार्यकर्ता का आवेश भरा भाषण तो कभी मुफ्ती साब का भाषण। उसमें खुला ऐलान की जब तक काम रास्ते का काम शुरू नहीं होगा हम यहां से नहीं उठेंगे। वहीं अवाम को शांति बनाए रखने की, गलत कदम न उठने की सूचना भी दी जा रही थी। ऐसे गरम हालात में उन्हें कुछ कहना.. मेरी हिम्मत जवाब दे रही थी। उनके पास जाना और उन्हें रास्ते से हटने को कहना मुझे खतरे से खाली नहीं लग रहा था। क्या मालूम आवेश से भरी जनता मेरे साथ क्या सलूक करे?”
पर एक मन कह रहा था “आनंद, हिम्मत कर और लोगों के बीचमें से जा.. मुखियाजी के सामने और बोल ट्रेफिक को मत रोको”
रास्ता रुकेगा देश रुकेगा। कारण मुझे जलगांव पहुंचना जरूरी था, सीजन के काम का टेंशन था, क्लाइंट को दिए कमिटमेंट का टेंशन था।
अंत में मैं भीड़ में घुस ही गया और मुफ्ती साब के सामने जाकर खड़ा हो गया। उनकी सफेद दाढ़ी, शांत चमकते चेहरे पर एक अलग ही सकून था। हिम्मत करके दोनों हाथ जोड़कर “नमस्ते” कहा, उन्होंने मेरी तरफ देखा। मैंने कहा “मैं जलगांव से हूं।” नाम बताना वहां फिजूल था, उस समुदाय में कौन पहचानेगा “आनंद मल्हारा” को। मैंने फिर कहा “मुफ्ती साब, मैं भीआपके साथ हुं , ऐसे हालातों में जरूरी है रास्ते पर आना”। मेरी बात सुनकर पास बैठे लोगों ने तालियां बजा दी। मेरी हिम्मत बढ़ी मैने फिर कहा “क्यों न हम कमिशनर के घर के बाहर ही धरना दे.. जिससे शायद जल्दी एक्शन ली जाए”, तो गर्दी में से कोई बोल उठा “अरे भाई, वे घर पर मिलते ही नहीं है। सब्जी आदि खरीदने मुंबई में ही रहते हैं”। मुफ्ती साब बोले “साल हो गया है , रोज बीसों हादसे इस रास्ते पर होते हैं, पर कोई काम ही नहीं हो रहा”।
क्रमशः आगेका भाग २ में..


