क्रमशः भाग २

क्रमशः भाग २

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मैंने मुफ्तीजी साहब से कहा “मुझे जलगांव जल्दी पहुंचना जरूरी है, आप यदि कहते हो तो मैं पैदल आगे निकलता हूं और बस आदि पकड़ कर जलगांव जाता हूं, कारण मेरी गाड़ी यहां के ट्रेफिक jam में फंस गई है”। उन्होंने साफ कह दिया “आप निकल जाओ, हम उठने वाले नहीं है जबतक काम शुरू नहीं होता”। फिर उन्होंने मेरे तरफ देखा और कहा “देखो इनकी गाड़ी कहां फंसी है, उसे निकालने में मदद करो”।

तुरंत दो भाईजान मुझे पूछते हैं “कहां है आपकी गाड़ी?” वे मेरे साथ आते हैं और निकलने का रास्ता बताते हैं। गाड़ी को रिवर्स u turn घुमा कर डिवाइडर के टूटे हिस्से में से निकलने की सलाह देते हैं। एक रिक्शा वाला उसकी रिक्शा बाजूमें करता है। रिवर्स में अड़ने वाली पुलिस की गाड़ी भी पुलिस दूर कर देते हैं। गाड़ी को पीछे की और घुमाने के लिए रास्ते के किनारे एकदम पतली जगह थी और उस जगह बड़े बड़े खड्डे थे जिसमें पानी भरा था और वहां “इंसान” पैदल चल सके इसलिए लोगों ने उसमें अच्छे खासे पत्थर डाल रखे थे। ड्राइवर गाड़ी में था तो मुझे ही पत्थर उठा कर साइड में डालने थे। बड़े बड़े पत्थर थे, कुछ तो मुझसे हिल भी नहीं रहे थे, फिर भी ये पत्थर कहीं गाड़ी के बेस को इतना डैमेज न कर दे कि गाड़ी ही बंद पड जाए। यह डर से हाथों में ताकत आ गई और पत्थर सरक गए, गाड़ी रिवर्स हो गई। और साइड के रास्ते से आगे के सफर के लिए निकल गई।

गंदे पानी में से पत्थर निकालते वक्त सामने खड़ा एक दुकान का मालिक मुझे देख रहा था। उसने मुझे इशारे से बुलाया और दुकान के सामने पानी से भरे ड्रम से मग में पानी निकालकर खुदसे से मेरे हाथ धुलाए। उनकी “इंसानियत” देख मन तृप्त हो गया। उस नेक दिल इंसान को दिल से “शुक्रिया” कहा और गाड़ी में बैठ निकल पड़ा।

मालेगांव के इस धरने के कारण मेरे जीवन का एक डेढ़ घंटा व्यर्थ नहीं अपितु उसने “जीवन के नए रंग” बताए, और थोड़ी मेरी “हिम्मत में इज़ाफा” भी कर दिया। और हमारे पूर्व उपजिल्हाधिकारी एवं मेरे स्नेही श्री देशमुखजी की कही बात “पॉलिटिकल लीडर अच्छे इंसान ही होते हैं.. अच्छे इंसान होते हैं इसीलिए उनके साथ जनता जुड़ती हैं …यह बात याद आ गई।

और रात को पोस्ट लिखते वक्त मुखियाजी का सही नाम, ओहदा आदि चेक करने गूगल किया तब एक न्यूज में मालेगांव का यही धरना दिखा । आधे स्क्रीन पर मुफ्ती साब बोल रहे हैं और दूसरे आधे में JCB और रोड रोलर चलते दिख रहा था। माने काम चालू कराकर ही माने।


है ना लाइफ इस ब्यूटीफुल but full of Helping n Caring।


आनंद मल्हारा
२० अक्तूबर २२, जलगांव



नोट…

जरा सोचें क्यों रास्ते के काम अनेक शहरों में ठीकसे नहीं हो पा रहे? क्या नगरसेवक नहीं चाहता होगा? क्या नगरपालिका का कर्मचारी नहीं चाहता होगा जिसे वहां मासिक वेतन मिलता है? क्या महापौर या कमीशनर नहीं चाहते होंगे? क्या आमदार, खासदार नहीं चाहते होंगे? यदि सब अच्छा रस्ता चाहते होंगे फिरभी यह क्यों नहीं संभव होता?
इसका केवल करप्शन कारण भी हो नहीं सकता। क्या अपनी सरकारी सिस्टम ज्यादा जटिल हो गई है और वहां काम करने वाले कर्मचारी उतने परफेक्ट नहीं? या उन्हें बाहर की कोई शक्ति काम करने नहीं दे रही? या उन्हें पर्याप्त ट्रेनिंग की, टेक्नो सेवी बनाने की जरूरत है? या उन्हें अब हर फील्ड के प्राइवेट एक्सपर्ट कंसल्टेंट की जरूरत है?

कारण कभी हम पढ़ते हैं ” मिला हुआ इतना निधि वापस चला गया”, “एक महीने में नए बने रास्ते में गिरे खड्डे”, “फला रास्ता कौनसा डिपार्टमेंट बनाएगा मालूम नही!” वगेरे वगेरे।

कल मेरे यहां कंसल्टेंट मित्र पारोलेकरजी आए थे। उन्होंने मेरी फैक्ट्री में विजिट की थी कह रहे थे “बुरा मत मानना आनंद बाहर से बेहतरीन दिखने वाली फैक्ट्री की अंदर की हालत हॉरिबल है। लगता है जैसे कंपनी बूढ़ी हो गई है। यदि उसपर सही काम नहीं किया गया तो शायद एक दिन वो बंद हो जाएगी। वहां करने के लिए बहुत कुछ है।
पर टाइम लगेगा।”

कॉरपोरेशन की हालत भगवान करे वैसे न हो, वो बूढ़ी न हो।

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