आ-हा-हा…से वाह-वा…. वाह-वा से हाय राम…लुट गया भगवान… तक का यादगार “अमृतसर” का ऐतिहासिक सफर !

आ-हा-हा…से वाह-वा…. वाह-वा से हाय राम…लुट गया भगवान… तक का यादगार “अमृतसर” का ऐतिहासिक सफर !

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बहुत दिनों से पंजाबी खाने का, देसी ढाबे में जा कर शेर-ए-पंजाब के स्वाद को ऐक्सप्लोर करनेकी दिली तम्मना थी. तो सीधा “अमृतसर”का ही प्लान बना लिया
सोचा “स्वाद” के साथ गोल्डन टेम्पल , वाघा बॉर्डर भी देखने हो जायेंगे।

श्रीमतीजी तो तैयार ही थी, सर्विस से छुट्टी जो ले रखी है. तन्वी को साथ आने तैयार किया. हा ना- हा ना करते करते टिकट बुक हो गए. तन्वी ने तनय को पटाया और उसका भी टिकट निकाला गया. बच्चों को बच्चे ही चाहिए होते हैं। और हम बच्चे बन नहीं पाते।केयर टेकर और सलाह देने की आदत से हम बाज़ नहीं आते…जो बच्चों को ज्यादा पसंद नहीं होता। वैसे आजकल बच्चों की व्यस्तता भी कम नहीं होती!

रेल गड्डी में बैठे. “सच्चखंड एक्सप्रेस” में आजु बाजु सब सरदारजी. नसीब से चारों सीट एक ही कपार्टमेंट में मिली।सफर ज्यादा मजेदार हो गया। बच्चों की नोक झोंक, ताश के पत्ते, तन्वी का छोटी छोटी इंस्टाग्राम के लिए रील बनाते रहने का पैशन, पहली बार सफर में खाने के पदार्थों को रखने अलग ट्राली बैग, अलग अलग व्यंजनों का स्वाद लेते सफ़र के डेढ़ दिन कब ख़त्म हुए समझ नहीं आया।

होटल में check in किया…रात हो गई थी। होटल “गोल्डन टेंपल”के पास ही थी। खाना कहां खाए ? तो होटल वाले ने ही ‘ब्रदर्स ढाबा’ का नाम बताया।भूख ज्यादा नहीं थी पर अमृतसर में खाना तो मिस नहीं कर सकते थे। ख़ाना खाने ही तो आए थे। गए ब्रदर्स ढाबे में। पंजाबी थाली ऑर्डर की तथा तनय ने लस्सी, मिठाई में फिरनी.

थाली आयी … दाल मखनी, बटर में लदी आटे से बनी तंदूरी रोटी, छोले मसाला, रायता, सलाद, और विनेगर में डूबे गुलाबी प्याज। खाने की “खुशबु” से ही श्रीमतीजी खुश हो गई।दाल मखनी में मक्खन भी था और स्वाद भी। खाने के बीच जब लस्सी ट्राय की तो मुंह से निकल ही गया आह! आहा! आहाहा !
फिरनी भी अच्छी थी. तृप्त हो गए।

बाहर निकले और सामने ही गोल्डन टेम्पल था, सोचा चलो थोड़ा घूम लेते हैं।रात के 10.30 बजे थे फिरभी लग रहा था जैसे 8-9 ही बजे हो। पूरा मार्किट शुरू था. सभी दुकाने एक जैसी, नाम के बोर्ड एक से,एक ही कलर स्कीम…थोड़ा जयपुर जैसा। मंदिर में जाने के लिए जूते जमा करते है…सर पर ऑरेंज रुमाल…पैर धोकर अंदर जाने को होते है कि मंदिर का दरबान सेवक ‘तनय’ को रोक लेता है , कहता है वो अंदर नहीं जा सकता! तब मालूम पड़ता है ‘हाफ पेंट’ मंदिर में वर्ज्य था। नलिनी कहती है ‘तनय” को छोड़कर नहीं जायेंगे।कल फिरसे आएंगे’।

दूसरे दिन साइट सीइंग का प्लान था। टैक्सी की। गाड़ी में बैठतेही ड्राइवर को समझाया हमारे स्वाद भरे mission के बारे में।उसे बताया कि हम अमृतसर क्यों आये हैं। वो भी समझ जाता है वो कहता है “ठीक है, आज हम नाश्ता अमृतसर के सबसे फेमस “कुल्छा land” पर करेंगे।और वहां से दो तीन मंदिर देख कर शाम 4.00 बजे तक “वाघा बोर्डेर”पहुंचेंगे।

‘कुल्छा लैंड’ पर पहुँचते हैं… “अमृतसरी कुल्छा आर्डर करते हैं।बटर में भीगा “कुल्छा” साथमें छोले और हरी चटनी बस. प्लेट सामने आती है. कुल्छे का एक बाईट छोले में डुबोकर, उसकी खुशबु लेते हुए खाते हैं … सबके मुंह से “वाहवा” निकलती है।अंत में “लस्सी” ट्राय करने का सोचते हैं , लस्सी भी एक नंबर।पेट भर जाता है, मन नहीं।मन कहता है एक प्लेट और हो जाये पर तन्वी मुझे देखकर कहती है ….”pappppa ?” सही भी था अभी लंच बाकि है, डिनर बाकि है कंट्रोल करना भी जरुरी है।

एक दो मंदिर देखते हैं।टाइम पास ही होता है ..पर साथमें चलना भी हो जाता है। “थकना” बहुत जरुरी था। थकेंगे नहीं तो “भूक”लगेगी नहीं…भूक लगेगी नहीं तो अमृतसर का “मिशन”कैसे सफल होगा?

क्रमशः भाग २

 

है ना लाइफ इस फुल ऑफ़ flavours…!

आनंद मल्हारा
३ मार्च २३ , जलगाँव