वाह-वा से हाय-राम लूट गया तक का ऐतिहासिक “अमृतसर” का सफ़र । भाग २

वाह-वा से हाय-राम लूट गया तक का ऐतिहासिक “अमृतसर” का सफ़र । भाग २

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वक़्त की कमी के कारण साधारण से ढाबे में ख़ाना खाकर ठीक ४ बजे वाघा बॉर्डर पर पहुँच गये। यह ऐसी जगह है जहाँ एक ओर हिंदुस्तान के लोग और दूसरी ओर पाकिस्तान के लोग आते हैं अपने सैनिकों की परेड, उनका जोश देखने।

दोनों ओर के सैनिक एक दूसरे को अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते परेड करते हैं और अपने फ्लैग को साथ में सन्मान पूर्वक नीचे उतारते हैं।

बोर्डेर के दोनों तरफ अपने अपने देश के हजारों नागरिक उस परेड को मानवंदना देते हैं। परेड करते सैनिकोंमें भारत माता की जय जयकार कर जान भरते हैं। और सैनिक अपनी परेड से देश के लिए मर मिटने के रुतबे से लाखों देश वासियों के दिलों में देश प्रेम की, देश भक्ति की ज्योत जलाते हैं। बहुत रोमांचकारी उत्सव होता है एक से डेढ़ घंटे का यह समारोह। और विशेष बात है यह है कि वहाँ रोज यह परेड होती है और रोज़ दोनों देशों के लाखों सैलानी उसे देखने पहुँचते हैं ।

मुझे और तन्नू को वहां एक बात थोड़ी अखरी और खटकी भी। वहाँ परेड में, प्रेजेंटेशन में शक्ति प्रदर्शन, एक दूसरे देश के सैनिकों को खुले आम दुश्मन कहने का और उसे मिटाने की चाह दिखाने का, सैनिकों द्वारा दुश्मन को कुचलने की पैरों की एक्शन कुछ अटपटी लगी।

दोनों पड़ोसी देश है, वहाँ दोनों तरफ से लोग इक्कठा होते हैं।वहाँ दुश्मनी की बजाय भाईचारे की बात हो, दुश्मनों के छक्के छुड़ा देंगे कि बजाय नफ़रत मिटाने के गीत बजाये जाये, दोनों तरफ के सैनिक एक दूसरे को ललकारने की बजाय गले मिले तो मुझे लगता है हम सबका कल “सुनहरा-सुखमय-शांतिमय”बनेगा।

हमारे पंतप्रधान आदरणीय मोदीजी को जरूर एक खत लिखूंगा…लिखूँगा ..हम वसुदैव कुटुंबकम की बातें करते हैं, खुदको अहिंसा, सहिष्णुता के पुरस्कर्ता मानते है तो बोर्डर जैसी सेंसिटिव जगह दुश्मनी जैसी, हिंसा पूरक भाषा क्यों?

अगले दिन हम प्लान अनुसार होटल बदलते हैं…कारण उसमें स्विमिंग टैंक जो था। पर जाने पर हमें निराशा हाथ लगी कारण स्विमिंग टैंक की सफ़ाई चल रही थी कारण वहाँ संपन्न हुए “हल्दी” के कार्यक्रम के कारण पूरा पानी “पिला” हो गया था। उस दिन हमने purchasing का प्लान किया, वहाँ के पापड़, अचार, वड़िया आदि ख़रीदी।

दोपहर का ख़ाना खाने हम वहाँ के मशहूर “केसर ढाबे” में गए जो मार्केट में स्थित है । पतली पतली गलियों में से वहाँ बैटरी ऑटो से जाना पड़ता है। ख़ुशक़िस्मत थे…गर्दी नहीं थी, वेटिंग नहीं थी। क्योंकि हम लेट थे..दोपहर के २.३० बजे थे । उस वक़्त अमृतसर के ज़्यादा तर टूरिस्ट वाघा बॉर्डर को देखने निकल जाते हैं।

बैरा “मेनू कार्ड” देता है, कहता है “साब, यहाँ आये हो तो यहाँ का चूर चूर पराठा और दाल मखनी ज़रूर ट्राय करो। वो तन्वी को और नलिनीजी को उनका किचन भी बताते है … वहाँ गैस पर लगी बड़ी बड़ी हाँड़ियों के बारे में पूछने पर बताते हैं “इसमें दाल पक रही है, छोंक लगाने के बाद इसे क़रीब १२ घंटे इसे गैस पर पकने देते हैं।

हमारी ऑर्डर दी डिशेज़ आती है… गरम गरम बटर में सीकें कड़क कड़क पराठे को प्लेट में परोसते वक़्त बैरा उसे दोनों हाथों से स्मैश कर या उसे हल्के से मसल कर प्लेट में रखता है। पराठे को मसलते वक़्त चूर चूर की आवाज़ आती है और शायद इसीलिए उसे “चूर चूर पराठा” कहा जाता है। पराठा, दाल दोनों “चंगी, sonni ..! “ तबियत खुश । फिर मँगाई अमृतसरी लस्सी । उसके क्या कहने। बनारस की रबड़ी लस्सी से भी ऊपर थी ये लस्सी।

ख़ाना खाकर हम बाहर निकले और चल पड़े ऐतिहासिक “जालियांवाला बाग”देखने। वहाँ का “लाइट एंड म्यूजिक शो”देखा। “जनरल डायर” के अत्याचार की कहानी फिरसे सुनी। स्टोरी, आवाज़ खूब थी पर लाइट शो, लेजर शो वीक था, एकदम साधारण था।

वहाँ से निकले और “गोल्डन टेम्पल” की ओर अग्रेसर हुए। आज टेम्पल को अंदर से देखना था । जालियाँ वाला बाग और गोल्डन टेम्पल दोनों अड़ोस पड़ोस में ही स्थित है।वही फिरसे जूते जमा किए, सर पर रूमाल बांधा और गोल्डन टेम्पल के प्रवेश द्वार तक पहुँचे। अंदर जाते वक़्त पैर धोये…अंदर प्रवेश करने लगे और गोल्डन टेम्पल के अंदर का सुनहरा नज़ारा … आँखें चौंधिया गई…

क्रमशः भाग ३

यस our life is also टूजीolden.

आनंद मल्हारा
५ मार्च २३, जलगाँव