गोल्डन टेम्पल का विशाल चौकोन परिसर…साफ़ पानी के बीच सुनहरा मंदिर! सफ़ेद और क्रीम कलर का मंदिर…उसका ऊपरी हिस्सा सोने से मढ़ा हुआ ..मंदिर पर की लाइटिंग …मंदिर की पानी में चमकती अदभुत परछाई सबके मन मोह लेती है । पानी को लगकर चारों ओर सराय और अलग अलग रूम्स। सराय की लॉबी में आराम करते, साधना करते, पानी में डुबकी लगाते भाविक, जगह जगह अलग अलग सेवा देते सेवक….वहाँ की सफ़ाई, अनुशासन सब कुछ विलोभनीय, प्रशंसनीय था..और ऊर्जामयी था।
रात दस बजे “गुरु ग्रंथ साहेब”की पालकी निकलती है। उसे भी क़रीब से देखा, “गुरु ग्रंथ” के प्रति भाविकों की अपार श्रद्धा का दर्शन हुआ। जैसे ही पालकी थमी सभी सेवक टेम्पल की सफ़ाई में मग्न हो गये । गुरु बानि के श्लोक कहते कहते सफ़ाई के कार्य में जुटे रहे। कई सेवक रेलिंग पाउडर लगाकर साफ़ कर रहे थे तो कई नीचे बिछे मैटिंग उठा रहे थे । कई महिलायें झाड़ू से सफ़ाई कर रही थी तो कोई भाविकों की सुरक्षा एवं अनुशासन बनाये रखने काम। पर सब में एक बात कॉमन थी…हर काम १०० नहीं २००% समर्पण के साथ हो रहा था।
मंदिर देखने के बाद “लंगर”में जाकर “प्रसाद” का सेवन किया।लंगर याने वहाँ की भोजन शाला जो २४/७ बिना रुके, बिना थमें चलती रहती है। वहाँ की तत्पर सिस्टम, सफ़ाई सब कुछ अनुभव करने योग्य था।
मंदिर से बाहर निकले, थोड़ा मार्केट में घूमे, जगह जगह गरम दूध की कड़ाई लगी थी। कढ़ाई में गरम होता दूध.. दूध के उपर मलाई की जाड़ी परत और परत पर ड्राई फ्रूट और केसर का छिड़काव मुझे बुलावा दे रही थी…तो दूध भी ट्राय कर ही लिया। बच्चोंने साथ नहीं दिया पर बीबीजी ने आधा दूध पी लिया जबकि उन्हें भी दूध पीने मना किया है डॉक्टर ने।
रात के ११.३० बज गये थे। अब होटल जाने का वक़्त हो गया था।“बैटरी ऑटो”वाले खड़े ही थे । एक से बात होती है ।लोकेशन डिटेल में पूछता है , भाड़ा तय होता है। आमने सामने सिट होती है। हम दोनों एक सिट पर और तनय, तन्वी सामने वाली सीट पर बैठते हैं। ड्राइवर कहता है “अपना सामान ठीक से रखो, पर्स, मोबाइल सम्भाल कर रखो। हम थोड़ा अलर्ट हो जाते हैं।
गाड़ी शुरू होती है। होटल क़रीब ७-८ किलो मीटर पर थी।गड्डी २० से भी कम की स्पीड से चल रही थी। ठंडी ठंडी हवा शरीर को छू रही थी कारण यह ऑटो ज़्यादा खुली होती है। तन्वी मोबाइल पर फ़ोटोज़ देख रही थी।तनय भी बीच बीच में मोबाईल पर कुछ टाइप कर रहा था। और बीच बीच में पीछे से आते लोगों को और विशेष कर मोटर साइकिल पर आते उन लड़कोकों जो तन्वी को तिरछी नज़र से देखते उनको देखता था। आगे ऑटो वाला फ़ोन पर गाड़ी चलाते चलाते बात कर रहा था…कहाँ जा रहे हैं शायद किसे बता रहा था। इस टाइप की ऑटो में ड्राइवर क्लियर दिखता नहीं है। मैं हमेशा की तरह रास्ते को, रास्ते के साइड के नज़ारो का आनंद ले रहा था। बीबीजी मुझे सटकर सिमटकर बैठी थी .. ठंड जो उसे लग रही थी।
हम होटल के क़रीब वाले ब्रिज के पास से गुजरते हैं। रास्ते में वहाँ अंधेरा होता है।
तभी अचानक तन्वी चिल्ला उठती है।तन्वी घबराये हुए स्वर में चीखती है …”मेरा मोबाइल… मेरा मोबाइल ???? “ “क्या हुआ” तनय पूछता है तो वह कहती है “मेरा मोबाइल मेरे हाथों में से किसीने छीन लिया.. देखो देखो वो दोनों मोटर साइकिल पर भाग रहे हैं ….हम सबके होश उड़ जाते हैं।मैं चिल्लाकर ऑटो वाले को कहता हूँ “देखो वो मोटरसाइकिल वाले भाग रहे हैं मोबाइल छीन कर…भगाओ गाड़ी“। पर वो कहता है “ मैंने बोला था न अपना सामान संभल कर रखो , यहाँ पर ऐसी वारदाते आए दिन होती रहती है।” बैटरी ऑटो की स्पीड कहाँ बढ़ती है। हमारे कुछ कर पाने के पहले वो मोटर साइकिल वाले लेफ्ट टर्न लेकर ग़ायब हो जाते हैं और हम चिल्लाते।
बीबी ज़ोर से रोने लग जाती है।”ओ बाई ओ बाई तन्नु का आईफ़ोन…तनु का आईफ़ोन .. अब क्या करें? “ रोते रोते ग़ुस्से वो तन्वी को मारने लगती है, कहती है “ कितनी केयर लेस है .. कितनी बार बोला..मोबाइल चलती गाड़ी में मत वापर पर सुनती ही नहीं…अब क्या होगा? ए भगवान मेरे साथ ही ऐसा क्यों? कितने गन्धे लोग है यहाँ के। नरक में भी जगह नहीं मिलेंगी उन कमीनों को…” बहुत कुछ बुरा भला कहती है..और अपना ग़ुस्सा बाहर निकालती है। वैसे ग़ुस्से में तो वो मुझे भी नहीं बख्शती तो उन चोर उच्चकों को कैसे छोड़ेगी। मैं उसे शांत करता हूँ । कहता हूँ अभी लड़ने का समय नहीं है।तनय को पूछता हूँ “तेरा ध्यान किधर था? “ पापा मुझे भी समझ में नहीं आया जबकि मेरा ध्यान रास्ते पर भी था।”
चलती गाड़ी के पीछे से किसीने मोटरसाइकिल पर आना, ओवरटेक करना और मोबाइल को हाथों में से छीन लेना….मुश्किल से ६-७ सेकंड में पूरा गेम हो गया।
ड्राइवर को पूछता हूँ “पुलिस स्टेशन कहाँ है ?”.. वो कहता है “बहुत दूर” तब तक होटल आ जाती है। ऑटो वाला होटल से दूर गाड़ी रोकता है। में फ़ास्ट होटल के रिसेप्शन पर आकर उसे क़िस्सा बताता हूँ । मेरे पीछे बीबी भी आ जाती है।पीछे ऑटो वाला निकल लेता है। रिसेप्शन वाला हमें रीलेक्स होने को कहता है, पानी देता है, बीबी को बैठने को कहता है और कहता है “चिंता मत करो, हम पुलिस को कंप्लेन करेंगे, मिल जाएगा मोबाइल “। मोबाइल का EMEI नंबर बताओ। सुनकर अच्छा लगता है।
है ना शब्दों की ताक़त … डॉक्टर कहता है “कुछ नहीं हुआ है” तो कैसे हम good फील करने लग जाते हैं!
भाग ४…
पर वो EMEI नंबर तन्नु के पास या हमारे पास सेव किया हुआ नहीं था। घर पर फ़ोन करते हैं … फ़ोन का डिब्बा ढूँढने का प्रयास हुआ पर नहीं मिला। फिर दूसरे दिन उसे ऑनलाइन ढूँढने की कोशिश करना…तब तक तन्वी के दोस्त को फ़ोन की लोकेशन मिलना.. पुलिस में कंप्लेन दर्ज करना…उसी दिन बिना मोबाइल तन्वी ने मुंबई काम के लिये निकलना… उतरे हुए चेहरे के साथ हमारा बयास जाकर आना। रोटरी के x डिस्ट्रिक्ट गवर्नर से बात करना और दूसरे दिन वापसी के टिकट का सम्मान कर मोबाइल का शोक मनाते, उसे याद करते वापसी की यात्रा करना भी नसीब में लिखा था।
पहले दिन वाले टैक्सी ड्राइवर हरप्रीत को जब यह क़िस्सा बताता हूँ तो उसे बहुत बुरा लगता है। वह उसकी पहचान से मदत करने की भरकर कोशिश भी करता है, बयास में मन्नत भी माँगता है पर हमारी क़िस्मत का क्या करें?
अमृतसरी क़िस्से को अब यहीं खत्म करते हैं….
धन्यवाद…मेरे साथ अमृतसर की लंबी सफ़र तय करने के लिए।
अमृतसर से मिली सीख …
१ अमृतसर में या जहां भी ज़्यादा टूरिस्ट होते हैं वहाँ चोर लुटेरे भी रहते ही हैं। मोबाइल, पर्स संभल कर रखना ज़रूरी है। चोर उचक्के ज़्यादा होशियार होते हैं… पीछा करते हैं.. आपस में मिल कर भी चोरी करते हैं।
२ फ़ैमिली के साथ जा रहे हो तो “सेनेटरी पैड” एक्स्ट्रा लेकर जाओ, मालूम नहीं कब किस बहन को काम आ जाये।
४ फ़ोन का EMEI नंबर फ़ैमिली में दूसरे के पास भी सेव करके रखो।ताकि मोबाइल गुमने पर नंबर मिल सके और उसे ट्रैक किया जा सके।
४ फ़ोन नंबर की एक सादी पॉकेट डायरीभी साथ रहने दे, मालूम नहीं कब काम आ जाए।
५ ऑटो से टैक्सी ज़्यादा सेफ हो सकती है।
६ गुम हुआ मोबाइल कम ही मिलता है। पुलिस से भी ज़्यादा अपेक्षा रखना व्यर्थ है।
जब मेरा मोबाइल ट्रेन में रह गया था तो लग रहा था शायद एक दिन कोई शरीफ आकर कहेगा “आनंद बाबू यह लो आपका मोबाइल।” पर नहीं आया। पर जब चोर ने ही छीना है यह मोबाइल तो किससे अपेक्षा करें?
समाप्त
होती है लाइफ में कभी ख़ुशी तो कभी ग़म…
आनंद मल्हारा
५ मार्च २३, जलगाँव


