10 मिनिट बाद मैं एकबार फिर फ़ोन लगाता हूँ …हमारे जलगाव की महानगरपालिका को कहता हूँ ‘साब गाड़ी जल्दी भेजो.’ वो कहता है…”गाड़ी निघाली आहे महाबळ मधून…रस्त्यावर काम सुरु आहे…दुसऱ्या रस्त्याने येत आहे.”
यह किस्सा है “कल” का…मैं और नलिनी सुबह सुबह ‘मेहरून तालाब’ की पाल पर हमेशा की तरह घूम रहे थे। रास्ते में एक जगह धुवाँ निकल रहा था, सच कहो तो उस जगह करीब एक महीने से धुवाँ निकल रहा था।एक डेढ़ साल पहले वहां एक हरा भरा नीम का बड़ा पेड़ हुआ करता था… एक सुबह वही झाड़ पाल पर धराशाही हुआ मिला…शायद उसे जैसे जोरदार “हार्ट अटैक” आया हो और उसका “दि एंड”।तब तीन चार दिन लग गए थे उसे रास्ते से साइड करने। उस पेड़ का 3-4 फ़ीट का तना ज़मीन से बाहर रह गया था। साल भर से वह सूखा बेढब सा तना रोज हम देखा करते थे।
करीब एक महीने पहले मालूम नहीं क्यों और किसने उसे जला दिया। वैसे भी उसे सही से काटने से जलाना आसान था।सोचा चलो रास्ता क्लियर हो गया।
रोज घूमने जाते रोज़ वहां धीमी आग सुलगती ही रहती। रोज उसी जगह से धुआँ निकलता रहता शायद तना जलने के बाद अब उसकी जड़ें जल रही हो।
देखते देखते दिन नहीं..एक महीना बीत गया पर आग बुझी नहीं।किसीने आग बुझाने उसमें बड़े बड़े पत्थर भी डाले ,पर रोज वो पत्थर ज़मीन में धंसते दीखते और धुआँ निकलते। देखते देखते वहां 4 फ़ीट तक का खड्डा हो गया और धुआँ रुकने का नाम ही नहीं लेता।
मैं रोज घूमते सोचता…काश मैं इस आग को पानी डाल कर बुझा पाता। कारण वहां पानी डालना भी आसान नहीं था, तालाब में से पानी निकाल कर ऊपर लाना मुश्किल था। पर कल एक मित्र मिल गए जो रोजाना पाल पर लगे पेड़ो को बीबी के साथ पानी डालते थे। मैंने उनसे कहा… चलो आज ये आग बुझाते हैं … हम दोनों ने मिलकर उस खड्डे में पानी डालना शुरू किया…मित्र नीचेसे जार में पानी भरकर ऊपर लाता और मैं उसे झाड़ के खड्डे में उंडेल देता।
दस पंद्रह पानी से भरे जार डालने हुए ही थे तब वहां दूसरे रोज घूमने वाले मित्र आते हैं और कहते हैं “आनंद भाई, इतनेसे पानी से कुछ नहीं होगा…हमने 5-6 लोगों की चैन बनाकर दो दिन पहले 100 से भी ज्यादा बाल्टी पानी डाला तब भी ये आग बुझी नहीं बल्कि उसमेंसे और ज्यादा धुवाँ निकलने लगा।
तो मैंने पूछा “तो अब क्या करें ? क्यों न एक टैंकर ही मंगाया जाये ? मैंने कहा। एक ने मुझे टैंकर वाले का number भी दिया, उसका नंबर नहीं लगा तो मैंने सहज कहा “क्यों न हम “अग्नि शमन” दल को ही कहें कि यहाँ झाड़ जल रहा है जल्दी गाड़ी भेजो?”
सब को आईडिया अच्छी लगी , उन्होंने हामी भरी।
मेरे मोबाइल में एक नंबर था “fire fighting” के नाम से। नंबर डाइल करता हूँ। नंबर महानगरपालिका में लगता है। सुबह के 8.30 बजे थे। उन्हें विषय समझाता हूँ… कहता हूँ “विषय गंभीर है, आग जमीन के अंदर जल रही है, झाड़ की जड़े जल रही है और जड़े तलाब के पानी तक पहुंची है, कहीं ऐसा ना हो जाये की इन जड़ों के जलने की वजह से पाल में दरार या कोई इंटरनल टनल बन जाये और तालाब के पानी का लिकेज शुरू हो जाये?
उन्होंने मेरा नाम पूछा, मोबाइल नंबर लिया और कहा “काळजी करू नका,मी लवकर गाड़ी पाठवितो”। 5 मिनिट से वापस फ़ोन लगाता हूँ…वे कहते हैं ‘गाड़ी निकल रही है और 10 मिनिट में पहुँच जाएगी। गाड़ी नहीं पहुँचती है तो मैं फिरसे फ़ोन लगाता हूँ और कहता हु “साब 20 मिनिट हो गए… इतने समय में तो एक घर या फैक्ट्री जलकर राख हो जाये ” वे कहते हैं ‘ऐसी बात नहीं है…यदि वैसी केस होती तो मैं डायरेक्ट गाड़ी यहीं से भिजवा देता. रास्ते में काम चालू है इसलिए वक़्त लग रहा है।
और करीब 9.03 मिनिट पर “अग्निशमन “की गाड़ी गणेश घाट पर पहुँचती है। पर वहीं रुक जाती है। मैं दौड़ते दौड़ते वहां तक जाता हूँ तो ड्राइवर साब कहते हैं… ‘यहाँ लगे बैरिकेड की वजह से गाड़ी अंदर नहीं आ सकेगी। हम उन्हें दूसरी छोटी गाड़ी भेजने कहते हैं. फिर उन्हें कहते हैं एक बार ट्राय तो करो, गाड़ी निकल जाएगी। वो ट्रॉय करता है और गाड़ी आराम से निकल जाती है।
गाड़ी झाड़ तक पहुँचती है. आग लगे खड्डे में पानी डालना शुरू करते हैं। हम उन्हें भरपूर पानी डालने को कहते है… मालूम नहीं आग ज़मीन में कहाँ तक फैली हो।
ड्राइवर ने उसका दुखड़ा बताया … कह रहा था ‘साब इस गाड़ी को थोड़ा भी स्क्रैच आया, कुछ नुकसान हुआ तो हमें हमारे खर्चे से इसे रिपेयर करना पड़ता है …इसलिए हम रिस्क लेना पसंद नहीं करते”।आग जैसे सीरियस विषय में गाड़ी को स्क्रैच नहीं लगे इसपर ड्राइवर सोचता है तो कहीं सिस्टम में सुधार की जरुरत लगती है।
हम सब उस टीम को ‘धन्यवाद्’ देते हैं और ‘चाय और नाश्ते’ के लिए बिनती करते हैं पर वे रुकते नहीं और अगली बार कहकर निकल जाते हैं। एक तकनिकी सलाह भी देकर जाते हैं…कहते हैं…अब इस खड्डे में मिटटी डाल कर पैक कर दो, यदि उसमें हवा नहीं जाएगी तो आग बुझ ही जाएगी.
जब ‘होम मिनिस्टर नलिनी ‘
को कहता हुँ कि वो नहीं आये नाश्ता करने तो भड़क जाती है.. “कौन खायेगा इसे…अब आप खाओ ये बाहर से मंगाए वडापाव….उनको घर पर बुलाने के बाद मंगाते तो क्या बिगड़ता?
तो एक नया अनुभव आया, आग लगना और फायर ब्रिगेड की गाड़ी बुलाने का। कम समय में गाड़ी पहुंचे इसलिए और सुविधा जरुरी लगती है.
है न लाइफ इस ऑलवेज नई।
आनंद मल्हारा
25 फ़रवरी 23


