करीब 15 दिन पुरानी बात है …
फैक्ट्री में प्लांट के कर्मचारियों ने मुझे बुलाया था. कारण था व्यवसाय को मध्य नज़र रखते मैंने एक कर्मचारी को काम से कम किया था. उसे काम पर पुनः ले लो यह उनकी नम्र मांग थी.
कर्मचारियों के साथ मीटिंग होती है. गीले शिकवे बाहर निकलते है. गलत फैमिया सामने आती है. आपसी दूरियों के कारणों पर बातें होती है. सही बीमारी समज में आती है . उस पर सब लोग मिलकर ‘मरहम’ लगाते है. दोपहर के 1.00 बजे का समय हुआ होता है … हँसते हँसते मीटिंग का ‘द हैप्पी एन्ड’ होता है.
और कुछ कर्मचारी सहज कहते हैं …
‘भाउ… आज आमच्या सोबत जेवण करा ना ..! “ मैं भी उतनेही उत्साह के साथ उस निमंत्रण को स्वीकार करता हूँ और
देखते देखते 30-40 कर्मचारी अपना टिफ़िन लेकर ऊपर हॉल में आ जाते हैं …टिफिन फटाफट खुलने लगते हैं . मुझे एक कर्मचारी उसके टिफ़िन के
ढक्कन में चपाती और चटनी और बर्तन में सब्जी देता है, हर कोई अपने डब्बे में से अच्छा अलग आइटम मुझे परोसता है.
यह पहला अनुभव था उनके साथ उनका टिफ़िन खाने का अपने 35 साल के कार्यकाल में. सच कहुँ तो उस खाने का स्वाद लाजवाब था. हर सब्जी का, दाल का, किसीके खिचड़ी का तो किसीके कढ़ी का स्वाद बेमिसाल था. उसके सामने बड़े बड़े रिसेप्शन के आइटम्स कहो या क्रूज़ में लगे 200-300 आइटम वाले बुफे सब मुझे फीके लगे थे .
आप भी कभी ट्राय करें ऐसी पार्टी को …सच में बड़ा मज़ा आएगा. उस दिन सचमुच मैंने ज्यादा खाया. खाकर तृप्त हुआ. कर्मचारियों को भी अच्छा लगा.
उस दिन मुझे अच्छी नींद भी आई और शायद उन्हें भी.
इस कहानी के थोडे फ़्लैश बैक में जाते हैं, फैक्ट्री में सब बराबर चल रहा था, पगार बढ़ना, बोनस, ट्रिप, छोटे मोटे अलग अलग कार्यक्रम सब होते रहते थे. मुझे खुदको शौक जो था. कंपनी भी प्रगति कर रही थी. फिर एक दिन अचानक मुझे एक लेटर मिलता है …वह लेटर कर्मचारियों की मांग का होता है , उसमें अधिकार की बात जताई जाती है …पर विशेष …वह लेटर किसी ‘लेबर यूनियन’ के लेटर पर टाइप किया होता है. मैं पढ़कर बहुत नर्वस हो जाता हूँ , बुरा लगता है… लगता है… मैं जो जो मुमकिन है सब कुछ कर रहा हूँ , शायद हमारे प्रिंटिंग फील्ड के दूसरे सभी इकाइयों से ज्यादा कर रहा हुँ , फिरभी ऐसा लेटर? परेशान हो जाता हूँ . तब विचार आता है यदि कर्मचारी खुश नहीं तो कंपनी क्यों चलाना ? बंद कर देते हैं . वैसेभी केवल पैसे कमाना न मेरा कभी उद्देश्य था न है. मैं फैक्ट्री बंद करने की एक नोटिस बनाता हूँ. तब एक कर्मचारी कहता है ‘ऐसा मत करो,सब ठीक हो जायेगा.’
करीब दो साल के बाद लोगों को लगा यूनियन का चुना रास्ता सही नहीं है और उससे कुछ हासिल होना नहीं है. और यूनियन का चैप्टर क्लोज हो जाता है.
कुछ वर्ष सब ठीक चला लेकिन फिर एक दिन लेटर आता है नई मांगो को लेकर नई यूनियन के साथ. इस वक़्त की यूनियन ज्यादा नियम जानती थी वो कंपनी को तकलीफ हो, मालिक को तकलीफ हो इसलिए अलग अलग जगह कम्प्लेन डाल रही थी जो शायद सभासद कर्मचारियों को भी मालूम नहीं होता था .
छोटी कंपनी है , बड़े लिमिटेड कंपनी जैसी तो पालिसी तो नहीं बना सकते. सरकारी हर कानून का 100% पालन करना भी असंभव था. लेबर डिपार्टमेंट से हमें नोटिस आने लगी, कुछ केसेस कोर्ट में शिफ्ट हो गए. तारीख पर कोर्ट जाना पड़ा. वहां पर ‘आनंद मल्हारा हाजिर हो’ भाग्य में यह भी सुनना था.
पर इस बार मुझे ज्यादा तकलीफ नहीं हुई . पर मेरा इंटरेस्ट फैक्ट्री में कम हो गया , वहां संभव नया डेवलपमेंट कुछ रुक सा गया. फिरसे यूनियन वाले सहयोगी तनाव में रहने लगे. काम वे करते पर दबाव के कारण वे नया नहीं कर पाते.
फिर मैंने सोचा …ये अपनी नादानी से मुझे कोर्ट के चक्कर लगवा सकते है तो चलो मैं भी कुछ लोग कम तो कर सकता हुँ . बिज़नेस भी कोरोना के बाद कम हो गया था. 1 कर्मचारी को कम कर दिया.
और उसके कारण यह मीटिंग सम्पन्न हुई.
मीटिंग में मैंने उनसे कहा ‘क्या तक़लीफ़ है तुम्हें यहाँ? टाइम पर पगार , ओवरटाइम ,टाइम पर बोनस, जरुरत पड़ने पर एडवांस, जितना बोला है वो सब देते हैं . तुम्हें मस्टर पर रखा है, मेडिकल के लिए esic की सुविधा है , तुम्हारी सेविंग हो, बादमें पेंशन मिले इसलिए pf शुरू किया है. और इससे ज्यादा मैं कुछ कर नहीं सकता. यदि आपको इससे अच्छी ऑफर कोई देता है तो मैं रोकूंगा नहीं. बोलो क्या तकलीफ है ? क्यों होना तुम्हें बाहर की लेबर यूनियन?
मैंने सबसे पूछा यूनियन वाले क्या देते हैं ? क्या वो पगार बढ़ा कर दे सकते हैं ? क्या वो तुम्हें एडवांस दे सकते हैं ? क्या उनके साथ रहकर कंपनी का डेवलपमेंट हो सकता है? मार्किट में तुम्हारी कंपनी का इतना नाम है .. क्यों उसे बदनाम करते हो? मैं समझा रहा था …यदि कंपनी को अपना मानते हो, यदि उससे आपका घर चलता है , कंपनी में लम्बे समय तक काम करना चाहते हो तो यूनियन की दलदल में से बाहर निकलो .
क्रमशः२
Hai na life is beautiful yet काम्प्लेक्स
आनंद मल्हारा
12/2/23, जलगाव
५६ भोग से भी स्वादिष्ट थी उस दिन की फैक्ट्री वाली वो दावत…!
भाग २
बात उन्हें जच रही थी. सबने कहा ‘हम भी कंपनी का डेवलपमेंट चाहते हैं …हम हर जिम्मेदारी को निभाएंगे…आप कंपनी को बढ़ाओ…और प्लीज आप उस कर्मचारी को वापस ले लो…हम भी यूनियन में से बहार निकल जायेंगे … मैंने भी उनकी बात मान ली. मीटिंग का हैप्पी एन्ड हो गया .
पर उनकी नाराजी क्या थी मालूम है? पगार, बोनस या फैसिलिटी नहीं थी .. वो थी मेरा फैक्ट्री में कम जाना, उनसे कम बातें करना यही मुख्य कारण था उनकी नाराजी का. सही भी था मैं फैक्ट्री बहुत कम जाता था …उन्हें लगता था उनकी सही जानकारी मुझ तक ‘मैनेजर’ पहुँचने नहीं देते. स्टाफ से वो नाराज थे. पेंशन के बारे में कुछ गलत फैमिया थी उन्हें. असल में वे वे खुद को insecured फील करते थे इसलिए उन्हें सहारे की लेबर यूनियन से जुड़ने की जरुरत महसूस हुई.
जबकि ऐसा नहीं था. मेरे लिए मेरे कर्मचारी मेरे जीवन के एक अहम् हिस्सा थे. मै उनके बारे मेँ सोचता रहता था और मैं ही क्यों ज्यादातर सभी मालिक अपने स्टाफ की बेहतरी सोचते ही है.
पर कहते है न बेतहाशा चाहने के बाद भी …बीबी को भी बोलना ही पड़ता है , जताना ही पड़ता है कि ‘ मैं तुम्हे प्यार करता हूँ …I love you ‘ प्यार से कहना ही पड़ता है कारण अक्सर उसकी कॉमन कंप्लेन रहती ही है कि आप मुझे प्यार नहीं करते।
Hai na life is beautiful yet काम्प्लेक्स
आनंद मल्हारा
12/2/23, जलगाव


