वहाँ “ कौवे “ को पूछा तो वो भी बता देंगे
“अवदुत गुप्ते”का घर कौनसा है !
क़िस्सा पिछले महीने का है…
बेटे “तनय” ने मुंबई बुलाया था “life unsolved” फ़िल्म के स्क्रीनिंग के लिए।उसीके कॉलेज के फाइनल ईयर प्रोजेक्ट के तहत बनी थी वो फ़िल्म । वैसे वह फ़िल्म दूसरे ग्रुप की थी पर “तनय” ने उसमें लीड रोल की एक्टिंग की थी इसलिए वो उत्सुक था हमें दिखाने। स्क्रीनिंग उसीके क्लासमेट “शाश्वत” के घर में था जिसने स्क्रिप्ट लिखी थी और उस फ़िल्म को डायरेक्ट की थी। उसका घर बोरिवली के पास था जहां हम मुंबई मेट्रो का मज़ा लेते लेते पहुँचते हैं। उसके पिताजी भी बॉलीवुड के जाने माने डायरेक्टर थे…तो उनका घर भी एक फ़िल्म का सेट जैसेही सजा था। घर भी अनोखा था। हमारे यहाँ जैसे डुप्लेक्स घर होते हैं वैसेही वो ट्रिप्लेक्स घर था… तीन मंज़िला। ख़ुदका टेरेस मुंबईमें कहाँ किसे नसीब होता है? छोटे से घर में दो दो कुत्ते, एक बिल्ली, साथ में दादी माँ, छोटा भाई ऐसा भरा पूरा वो बंगाली परिवार था। घर के पिछवाड़े में लगा पेड़ आज घर के अंदर स्लैब को चीरता दूसरे मंज़िल तक पहुँच चुका था। २५ मिनिट लंबी वो बेहतरीन फ़िल्म हम सब ने सांस रोककर देखी।अरे हाँ साथ में गरम गरम समोसे, कोल्ड ड्रिंक का भी लुफ् तउठाया।
दूसरे दिन तनय को कॉलेज जाना था ।तन्वी को भी शूटिंग के लिये जाना था।
पर सुबह ७.०० बजे दोनों सो रहे थे।
श्रीमतिजीकी भी तबियत थोड़ी नरम गरम थी.. तो हमने सोचा चलो आज “गोराई बीच” ही चले जाते हैं सुबह सुबह। कॉलेज के दिनों में एक बार गया था वहाँ। हम दोनों ऑटो में बैठकर पहले बोरिवली की खाड़ी … फिर “जेट्टी बोट” में बैठकर गोराई गाँव … वहाँ से ऑटो में बैठकर “गोराई बीच”पहुँचते हैं ।
समुंदर में low tide था…उपर से मटमैला पानी…मज़ा नहीं आया … आगे जाकर पैर गीले करके लौट पड़े। उस दिन पानी को देख उसमें स्नान करने की इच्छा ही नहीं हुई।
लौटते वक़्त बोट में बैठने लगे तो देखा एक “बाइक स्वार” पूरी तरह कीचड़ में लत पत खड़ा था…उसकी एनफील्ड गाड़ी भी कीचड़ से भरी थी। और वह बोट वाले को थोड़े डुलते डुलते “मोबाइल” माँग रहा था। हमने पूछा क्या माजरा है तो बोट चालक कहने लगा ये महाशय रात भर यहीं पार्टी कर रहा था। सुबह तक toon था और जब वो बाइक पर बैठकर बोट की तरफ़ आ रहा था तब बोट की बजाय डायरेक्ट खाड़ी में गिर गया। नसीब से किनारे पर ही गिरा… ज़्यादा नहीं लगी।उसे हम सबने मिलकर बाहर निकाला है। देखो अभी तक उतरी नहीं है, अब भी हिल रहा है । उसका मोबाइल भी पानी में गीला हो गया ।
तब किसीने पानी की मोटर चालू करके उसकी मोटरसाइकिल पर पानी मारना शुरू किया…धीरे धीरे उसकी गाड़ी और वो ख़ुद साफ़ हो गये। लोग भी उस महाशय से छोटे छोटे काम के पैसे ऐंठ रहे थे। और वो भी रूबाब से गीली गीली नोट जेब में से निकल कर लोगों में बाँट रहा था।
शाम को क्या करें….तो हा ना – हा ना करते करते “नेशनल पार्क” जाने का प्रोग्राम बनाते हैं । ५ बजे घर से निकलते हैं और ३० मिनिट में बोरिवली नेशनल
पार्क के गेट पर पहुँच जाते हैं। टिकट विंडो ढूँढते हैं तो वॉचमन कहता है “साब पार्क तो ६.०० बजे बंद हो जाता है…टिकट विंडो बंद हो गई है “। मैं पूछता हूँ “कभी गार्डन ६.० बजे बंद होता है क्या? हमारे यहाँ तो गार्डन शुरू ही शाम को होता है। दोपहर में बंद रहता है”।फिर समज में आता है यह नेशनल पार्क है इसमें अलग अलग प्राणी बसते हैं। शाम को उसमें घूमना रिस्की होता होगा।
अब क्या करे सोचने लगते हैं। सबसे पहले किनारे से लगी फ़ूड स्टाल चेक करते हैं। कुछ ठीक नहीं दिखता तो मूंगफली ही ख़रीद लेते हैं और रेस्तराँ ढूँढते हैं। सोचते सोचते मुझे “आनंद गुप्ते”सर जो बोरिवली में नेशनल पार्क के आस पास रहते हैं याद आते हैं। गुप्ते सर याने बीज एडवरटाइजिंग के मालिक और सेलिब्रिटी सिंगर “अवदूत गुप्ते” के पिताजी और हमारे दोस्त। नलिनी को पूछता हूँ “चलें क्या उनके घर?” वो कहती है “आप बोलो”। “ठीक है” मैं कहता हूँ और अपने मोबाइल में गुप्ते सर का नंबर ढूँढता हूँ। उन्हें कॉल करता हूँ .. ५-६ घंटी बजती है और फ़ोन पर “हेलो”की आवाज आती है। वो गुप्ते सर की ही आवाज होती है। “काय…कस काय ?और थोड़ी इधर उधर की बात होती है और अंत में मैं उन्हें हक़ीक़त बताता हूँ और पूछता हूँ “वेळ आहे का? येउ का घरी भेटायला”? तो वो कहते हैं “ ये की.” आवाज में वही उत्साह था। उन्हें एड्रेस पूछता हूँ वे कहते हैं “नेशनल पार्क च्या समोर तोंड करुन उभा राहिलास की उजव्या बाजूचा रस्ता पकड, नदी पार केले की श्री कृष्ण कॉलोनी येईल .. नंतर एक गणपतीचे मंदिर आणि त्या समोरच आहे माझं बंगला…मैंने उनसे कहा “सर लोकेशन शेयर करा ना…सोप होइल “.
“ते मला नाही जमत पण लक्ष्यात ठेव इथल्या “कावळ्यांना “ ही विचारले ना की “अवदूत गुप्ते” चे घर कोणते तर तेही सांगतील …!”
सर का डायलॉग सुनकर तबियत खुश हो गई। सर हे ही एक ज़बरदस्त “कॉपी राइटर और “भन्नाट स्पीकर”।
भाग २…
गुप्ते सर का “टाइटल” वाला डायलॉग सुन कर हम दोनों निश्चिंत होकर चल पड़े उन्होंने बताये रास्ते से अवधूत गुप्ते का अर्थात् उनका घर ढूँढने। ज़्यादा वक़्त नहीं लगा… ५-७ मिनिट में हम उनके घर नहीं एक आकर्षक हरियाली के बीच घिरे बँगले के तक पहुँच गये। एक आर्टिस्ट का घर दूर से ही मालूम पड़ जाता है।फिरसे सर को फ़ोन लगाया कारण कंपाउंड का गेट बंद था।सिक्योरिटी केबिन में सिक्योरिटी मैन नहीं था पर हाँ स्ट्रॉंग सिक्योरिटी सिस्टम लगी थी, इंटरकॉम भी लगा था। सर बँगले से बाहर आते हैं…दूर से नमस्कार भी हो जाता है। फिर वे जैसा फ़ोन पर बताते हैं वैसा कुछ हम उलटा पुल्टा करते हैं और अंत में दरवाज़ा खुल जाता है और हम अंदर।
सर गरम जोश के साथ हमारा स्वागत करते हैं। अंदर जाते जाते वे यह भी बताते हैं कि अब घर एक सेलिब्रिटी का भी है तो सिक्योरिटी सिस्टम ज़रूरी हो जाती है.. नहीं तो फैन अवदूत को परेशान करते हैं। बात सही थी। फैन क्रेज़ी हुआ करते हैं यह हमने भी क़रीब से देखा है।
अंदर सोफा पर बैठते हैं ।घर को चारों और से देखते हैं…चार पाँच लंबी सांस लेते हैं और फिर बातों का क़िस्सा शुरू होता है। सबसे पहले वे पूछते हैं “आनंद काय घेशील? चाय – कॉफ़ी?” मैं कहता हूँ “ज़रूरत नहीं बस मिलने आया हूँ।” वे आग्रह करते हैं और अंत में वे अपने पोते को मस्त गरमा गरम “चाय” बनाने का प्यार से आदेश देते हैं। कारण उस समय उनकी धर्म पत्नी बाहर गई हुई थी और काम वाली बाई भी घर नहीं थी।
इधर उधर की बातें होती है। पहले घर बनाया था तब कैसा था फिर अवधूत ने घर में कैसे बदलाव किए … उसे मॉडर्न बनाया दिखा रहे थे। घर के सामने नेशनल पार्क होने से घर में बन्दरों का आना, अलग अलग प्राणियों के साथ एक बार कंपाउंड में आया “चीता” का मज़ेदार क़िस्सा सुना रहे थे। “चीता” उनकी कार के “टब” पर बैठा था…फिर कैसे उसे गाड़ी के फोकस मारके भगाया था बता रहे थे।
चाय आ जाती है और चुस्की लेते लेते मैं पूछता हूँ “आता वाहिनी ( भाभीजी) कश्या आहेत?” कारण मैंने सुना था उनकी तबियत सीरियस थी और उनके इलाज के लिए सर काफ़ी महीनों तक सब काम छोड़ मद्रास में रह रहे थे। वे कहते हैं “अब अच्छी है..अभी अभी उसने बाहर निकालना शुरू किया है…बहन के यहाँ गई है।” मैंने पूछा “क्या हुआ था” तब मालूम पड़ा उनके लंग्स का ट्रांस्प्लांट हुआ है। बहुत सीरियस और रेयर केस थी। वैसे भी ऑर्गन ट्रांस्प्लांट करना काफ़ी जटिल और महँगा काम होता है। और उसमें चेस्ट का तो और ज़्यादा मुश्किल।
ट्रांस्प्लांट के लिये अप्लाई करना और सर्जरी के लिए भारत का बेहतरीन मद्रास हॉस्पिटल चुनना… ट्रांस्प्लांट के पहले ज़रूरी तैयारी के लिए.. रेग्युलर चेकअप के लिये मद्रास शिफ्ट होना.. हॉस्पिटल के पास फ्लैट लेना…उसमें एक रूम को पूरा मेडिकली तयार करना उसे इन्फेक्शन फ्री बनाना और क़रीब ७-८ महीने वहाँ रहना बहुत रोमांचकारी कहानी थी ।
जब कभी वो ऑर्गन देशमें अवेलेबल होता तब वेटिंग लिस्ट के दो या तीन पेशेंट को रेडी रहना पड़ता था कारण वो ऑर्गन यदि एक नंबर के पेशेंट से मैच नहीं हुआ तो तुरंत दो नंबर के पेशेंट से …नहीं तो अगले नंबर के पेशेंट से मैच करते और फिर तुरंत ऑपरेशन।
सर बता रहे थे ऑपरेशन के वक़्त क़रीब ७-८ अलग अलग फ़ील्ड के स्पेशलिस्ट डॉक्टर्स की उपस्थिति में ही ऐसे ऑपरेशंस होते हैं… ताकि ऑपरेशन के वक़्त कुछ भी इमरजेंसी उभरती है या कॉम्प्लिकेशन सामने आता है तो उसे हैंडल किया जा सके।
७-८ महीने बाद उनका नंबर आता है और नसीब से उपलब्ध हुआ ऑर्गन भाभीजी से मैच हो जाता है और ऑपरेशन भी सफल हो जाता है। शायद ऑर्गन मुंबई से स्पेशल प्लेन द्वारा मद्रास आता है और एयरपोर्ट से स्पेशल कॉरिडोर से वो हॉस्पिटल तक पहुँचता है। वे बता रहे थे कितना खर्च हुआ। सुनकर पहले तो मुझे भरोसा ही नहीं हो रहा था। पर धीरे धीरे हो गया। हाँ यही ऑपरेशन किसी काबिल गवर्नमेंट हॉस्पिटल में हुआ होता तो निश्चित खर्चा कम लगता। पर लाइफ के आगे पैसों की क्या क़ीमत?
तभी घर में घंटी बजती है और “भाभीजी”घर आ जाते हैं। हम उठकर उन्हे नमस्ते करते हैं । पहली बार ही उन्हे देखा और मिल रहा था। सर हमारी पहचान कराते हैं…विकास का भाई…तनय के पेरेंट। वे तुरंत मुस्कुराते हुए पूछती है “काय खाणार? मी “पोहे”बनविते..!” बहुत मना करने पर वो मानती है और “दूर” हम सबके साथ बैठ जाती है। उन्हें “तनय… डांस” भी याद था कारण उन्होंने भी “तनय” को वोट दिया था।
सर बताते हैं…अभी भी घर में उनकी रूम स्पेशल है जिसमें हम जा नहीं सकते कारण इन्फेक्शन का डर अभी भी ख़त्म नहीं हुआ है। सुनकर मैं सतर्क हो जाता हूँ कारण मुझे उस दिन थोड़ा “कफ़”था। तो मैंने ही कहा “सर अब हम चलते हैं , देखो मुझे थोडी खांसी भी आ रही है।” हम उठ जाते हैं पर भाभीजी आग्रह के साथ कहती है “लवकर परत या… सावकाश या .. आणि या वेळी जेवण करूनच जा।” उनका स्नेह भाव सुनकर हमारी श्रीमतीजी को विशेष अच्छा लगता है।
“नमस्ते” कहकर हम उनसे बिदाई लेते हैं।
यह ट्रांस्प्लांट का क़िस्सा बहुत रोमांचकारी, नई जानकारी पूर्ण और लंबा था। मैंने शोर्ट में लिखा है।मुझे तो यह पूरे एक फ़िल्म की कहानी बन सकती है।इस क़िस्से को यदि हम गुप्ते सर के ज़ुबानी सुने तो उसकी बात ही और होगी । हो सकेगा तो उनका इस विषय पर एक टॉक शो ज़रूरी अरेंज करेंगे।
समाप्त
लाइफ इस ब्यूटीफुल
आनंद मल्हारा
२/७/२३, मुंबई


