योगा प्राणायाम किया मल्हार लॉन में चोकअप क्लियर हुआ १० वर्ष बाद नगरपालिका के अकाउंट डिपार्टमेंट में !

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क़िस्सा मज़ेदार है ! ऊटपटाँग भी है ! पर सीरियस है। विपश्यना में गोयंकाजी समझाते हैं हर चीज़ का, हर संवेदना का अंत होता है… हर घड़ी शरीर में… अपने परिवेश में बदल होता रहता है।वक़्त बदलता है, हालात बदलते हैं। कहाँ के डॉट कहाँ कनेक्ट होते हैं कह नहीं सकते। कुछ ऐसा ही मज़ेदार अनुभव शेयर कर रहा हूँ।

हमारे घर की छोटीसी पर लॉन पर पिछले क़रीब १० सालों से रेग्युलर “योगा प्राणायाम ” होता है। प्रातः ६.०० बजे एक बैच चलती है। स्वार्थ यही रहा कि अच्छी वह जगह सकारात्मक vibrations से मालामाल होती रहे।अभी तक न जाने कितने साधक आये , बंद हुए… फिर आये.. पर नये नये आते रहे ।इतना ही क्यों टीचर भी बदल गए पर कुछ पुराने साधक टीके रहे।नये टीचर बनते रहे…बैच चलती रही।

उसमें हमारे साथ एक साधक है “श्री कैलाश” सर। सर रेग्युलर साधक है, मित भाषी है, दिल के साफ़, जवाँ है, कॉलेज में विद्यार्थी प्रिय प्राध्यापक है और संवेदनशील भी। यह मैं इसलिए भी कह सकता हूँ कि जब जब मैंने किसी सोशल प्रोजेक्ट के लिये सोशल मीडिया पर मदद माँगी होगी, उन्होंने उसनें हमेशा अपना योगदान देने की ख्वाहिश ज़ाहिर की।

सर भी रिटायर्ड हो रहे हैं इसी महीने। बढ़ती उम्र में शरीर को लचीला रखने या स्वस्थ रखने का पूरा प्रयास करते हैं कैलाश सर। पर “योग निद्रा” और “शवासन” उनका पसंदीदा प्राणायाम है।वैसे भी हमारी सीनियर सिटीजन वाली बैच में “योग निद्रा” सब को ही पसंद आती है … सच कहो तो आराम करना किसे पसंद नहीं?

पर हमारी श्रीमतीजी को योग निद्रा नहीं सुहाती कारण उनका मिशन हमसे अलग रहता था। जैसे वजन कम करना, पेट की बढ़ी चरबी को कम करना, जवाँ दिखना, सब आसनों में आदर्श स्थिति दर्शाना उनका चाह रहती। योग निद्रा मतलब १०-१२ मिमिट “वेस्ट” उसका मानना था।

एक घंटे में आधा घंटा रोजाना प्राणायाम होता ही है।जिसमें साँस के अलग अलग प्रयोग लिए जाते हैं ताकि अपनी शरीर के ब्लॉकेज खुलते रहे या ब्लॉकेज बढ़े नहीं।

उस दिन शायद छुट्टी का दिन था , में भी मेंटली फ्री था। बीबीजी की तो वैसेभी छुट्टियाँ चल रही थी , मैंने सहज वानखेड़े सर और कोली सर को चाय पीकर जाने को कहा। वो भी मान गये। ऊपर आये खुले बाल्कनी में बैठे। ऊपर से तालाब का नज़ारा…नीला पानी देखने पर अक्सर मेहमानों को फ्रेश महसूस होता है। गप शप चलती है। श्रीमतीजी चाय बनाकर बाहर लेकर आती है, मैं अंदर से कराची बिस्किट लेकर आता हूँ । चाय पीते पीते इधर उधर की बातें जारी रहती है और मालूम नहीं बातों बातों में क्यों म्युनिसिपल कॉरपोरेशन की बात निकलती है।

कैलाश सर प्राउड के साथ कहते हैं “मेरा छोटाभाई अभी कारपोरेशन में ट्रांसफ़र हो कर आया है।अकाउंट डिपार्टमेंट का हेड है। पूरी पेमेंट सिस्टम उनके अंडर होती है।और उन्होंने कम समय में बहुत अच्छा काम किया है। स्टाफ आदि सबके पेमेंट अब समय पर हो रहे हैं।मैंने मज़ाक़ में कहा “सर,माझे ही पेमेंट अड़कले आहे कॉरपोरेशन मध्ये .. खूप वर्ष झाले पण आता कोणाला भेटायचे हेच समजत नाही…सांगून पाहा”। कितना बाक़ी है पूछने पर मैंने बताया क़रीब २-३ लाख।

सर को भी सुनकर अचरज हुआ और बुरा भी लगा। उन्होंने तुरंत कहा “मैं भाई से बात करूँगा, वो सबके पेमेंट निकालते हैं तो अपना भी निकालेंगे।” यह सुनकर श्रीमतीजी ख़ुश हो गई। मैंने मज़ाक़ में कह ही दिया “ चाय पर लोगों को, मित्रों को बुलाया करो मॅडम, देखो कितना बड़ा काम हो गया”। उसने भी हंसकर उसे सहज स्वीकृति दी।

दो दिन बाद सर का फ़ोन आता है कहते हैं “मैंने भाई से बात कर ली है…तुम तुम्हारे पुराने बीलों की फ़ाईल लेकर उनसे मिल लो”। हमारे अकाउंटेंट के पास फाइल रेडी ही थी । मैंने उसे मिलने को कहा। वो काम काम में उसे भूल गया तो दो दिन बाद सर पुनः पूछते है “भाई को मिले क्या?” तो मैं कहता हूँ “आज मैं जाने वाला हूँ”।

क्रमशः भाग २

यस…लाइफ इस ब्यूटीफ्यूल।

आनंद मल्हारा
२७ मार्च २०२३, जलगाँव

 

योगा प्राणायाम किया १० वर्ष मल्हार लॉन में डेढ़ लाख का पेमेंट मिला म्युनिसिपल कारपोरेशन से ! | भाग २

हम “चीफ़ अकाउण्ट ऑफिसर” को मिलने कॉरपोरेशन के ऑफिस जाते हैं, वे हमारे श्रीकांत सर के भाई है इसलिए हिचकचाहट नही थी।कार्ड अंदर भेजते हैं, ५-७ मिनिट के बाद हमें अंदर बुलाया जाता है।
कोर्ट में “जज” की जैसे ऊँचाई पर बैठने की अरेंजमेंट होती है वैसे उनका भी टेबल एक स्टेप अप था। ऊपर से उनकी पर्सनालिटी भी रुबाबदार थी। हमें गर्दन ऊपर की ओर उठाकर उनसे बात करनी पड़ती है।

वे पूछते हैं “बोलो क्या बात है? “ मैं शोर्ट में कहानी बताता हूँ। जब वो डिटेल पूछते हैं तो हमारा फाइनेंस हेड मिस्टर शाह उन्हें डिटेल बताता है, बिलों की फाइल देता है। वे उस पर नज़र घुमाते हैं और कहते हैं “आयुक्त के नाम से लेटर बनाकर ऊपर फाइल दे दो … फिर देखते हैं क्या कर सकते हैं।” वे अकाउंटेंट को बुलाते हैं…वो भी हमारे बारेमें और अकाउंट डिपार्टमेंट में मल्हार के विज्ञापन के पेंडिंग बील के बारे में बताता है।

मैं साब को हमारा नये साल का कैलेंडर देता हूँ , कुछ बातें होती है और वो पूछते हैं “१५ साल पुराने यह बिल है…अभी तक क्या किया? क्यों ये पेमेंट नहीं हुआ?” मैंने सहज कहा “हमने काफ़ी फॉलोअप लिया, एक बार तो वकील की नोटिस भी दी पर कोई लाभ नहीं हुआ। किससे बात करें यही समझ नहीं आया। एक बार पहले भी आपकी पोस्ट के किसी ऑफिसर से मिले थे पर कुछ सुनवाई नहीं हुई तो हमनें आशा ही छोड़ दी। सोचा…अपनी ही कॉरपोरेशन है…जाने दो।”उन्होंने कहा “अमाऊंट बड़ी है तो भी”।
तब मैंने कहा “नगरपालिका का मूझपर बड़ा ऐहसान है । मैंरे व्यवसाय को क़रीब १० से १२ वर्ष नगरपालिका ने सम्भाला। आ. दादा और प्रदीप भाई के वक़्त मेरा सबसे बड़ा ग्राहक नगरपालिका रहा करता था।बहुत अच्छा काम करने का मौक़ा मिला। फीर एक दिन सत्ता बदली और हमारे बिल जहां के वहाँ अटक गये, बिल्कुल स्टैच्यू के माफ़िक़।”
साब ने मेरे तरफ़ उत्सुकता से देखा फिर खेद व्यक्त करते हुए कहा “ऐसा नहीं होना चाहिए था, थोड़ा थोड़ा ही सही पेमेंट होना चाहिये था।

अगले दिन हमारा शाह लेटर और बिलों की फाइल आयुक्त के नाम देता है । १५-२० दिन बाद कॉरपोरेशन के लिपिक का फ़ोन आता है और कहता है “तुमचे काही बिल पास झाले आहे म्हणून तुमचे बँक डीटेल व पॅनकार्ड ची कॉपी ऑफिस ला पाठवा”!
मैं पूछता हूँ “कितनी अमाउंट के बील है?”तो वो कहता है “जवळपास सव्वा ते दिड लाखाचे असतील.” सुनकर मन “बाग बाग”हो गया।

सवाल अमाउण्ट का नहीं था। हो रही ख़ुशी पैसों की नहीं थी , ख़ुशी थी इस “चमत्कार” की।१५ साल बाद अचानक कुछ ऐसा घटना और पेमेंट मिलना …। आप ही बोलो इसे क्या कहेंगे? बोलो है ना लाइफ इस ब्यूटीफुल … हर दिन नया। कुछ सरप्राइजिंग।

दूसरे दिन सुबह योगा के क्लास में मैं जाता हूँ और हमारे “श्रीकांत सर” को धन्यवाद देता हूँ और कहता हूँ “देखा अपने प्राणायाम का असर ? अपने इस १० साल के प्राणायाम ने नगरपालिका के अकाउंट डिपार्टमेंट का ब्लाकेज खोल दिया”।

सुनकर सब हँसने लग जाते हैं।पर इस सच को भी नकारा नहीं जा सकता… योगा एक अच्छी पहल…अच्छी सेहत… अच्छे लोग….अच्छे दोस्त…,सकारात्मक सोच…और अच्छा नतीज़ा…पलेही उसे १० वर्ष क्यों ना लगे हो!
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यस…लाइफ इस ब्यूटीफ्यूल।

आनंद मल्हारा
२७ मार्च २०२३, जलगाँव