इंडिगो की सफ़र ने दिया “वीआईपी लाउंज” का जॉय और “वीआईपी मक्खी” से कराई मुलाक़ात!

इंडिगो की सफ़र ने दिया “वीआईपी लाउंज” का जॉय और “वीआईपी मक्खी” से कराई मुलाक़ात!

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बात परसों की है…
बेटी तन्वी को मिलने ‘जोधपुर’ जा रहा था। तन्वी ने मुंबई से जोधपुर का “इंडिगो एयरलाइंस” का टिकट बुक कराया था।
ऑनलाइन “चेक इन” नहीं हो पाने से एयर पोर्ट के अंदर लगे कीओस्क पर पहली बार सेल्फ चेक इन करना पड़ा।आसान प्रोसेस होती है पर फिर भी थोड़ा टेंशन तो आता ही है।

सिक्योरिटी चेक के बाद गेट ४१ तक जाते वक़्त दो जगह “वीआईपी लाउंज” के बोर्ड दिखें…जहां पैसेंजर अंदर बाहर आ जा रहे थे। जब जब भी एयर ट्रैवल किया हर वक़्त “वीआईपी लाउंज” मेरे लिये एक पहेली रही थी। लाउंज में कौन जा सकता है…जानने की उत्सुकता रहती … या सच कहो तो अंदर जाने की इच्छा होती थी पर टीपीकल मिडल क्लास वाला डर था…जैसे कॉलेज के दिनों में मुंबई के “गेट वे ऑफ़ इंडिया” देखते वक्त वहाँ स्थित “ताज होटल” के गेट के अंदर जाने के सोचने पर होता था।

आज अकेला था.. वक़्त भी था तो “तन्वी” को कॉल कर “वीआईपी लाउंज”के बारे में पूछता हूँ तो वो कहती है “पापा, आपके पास “क्रेडिट कार्ड” है ना…तो आप अंदर जा सकते हो। काउंटर पर बात करो।मैं डरते या कहो संकोच के साथ लाइन में खड़ा हो जाता हूँ…मेरा एचडीएफ़सी वाला कार्ड रिसेप्शनिस्ट को देता हूँ। बात बन जाती है। पूछता हूँ “अंदर क्या होता है?”तो रिसेप्शनिस्ट कहती है “ You can Relax, have free Internet and complimentary Breakfast, tea/coffee inside.”

अंदर जाता हूँ , बूफ़े स्टाइल में ब्रेकफास्ट लगा था। काफ़ी आइटम थे। चाय कॉफ़ी और कोल्ड ड्रिंक भी । अंदर सब न्यूज़ पेपर भी रखे थे। पढ़ो या चाहो तो लेकर जाओ। अंदर कंप्यूटर्स भी लगे थे ताकि गेस्ट अपने मेल चेक या कुछ काम कर सके। कोज़ी सोफ़ाज थे, चेयर्स थी रिलैक्स होने के लिये।

नाश्ता, आराम और आदत से मजबूर सभी
रखे अख़बार देखकर बाहर निकलता हूँ । कुछ जिज्ञासा बाक़ी थी तो रिसेप्शनिस्ट को पूछता हूँ की “इंटरनेशनल डेबिट कार्ड भी चलता है क्या?” वो “हाँ” कहती है…पर उसमें लाउंज ऐक्सेस होना चाहिए और फ्लाइट डिपार्चर के ३ घंटे पहले तक आप यहाँ आ सकते हो।

यदि आपने भी वीआईपी लाउंज को एक्स्प्लोर नहीं किया हो तो ज़रूर ट्राय करें…बस अपना क्रेडिट या डेबिट कार्ड साथ होना ज़रूरी है। बाक़ी एयर पोर्ट के अंदर लगे रेस्टोरेंट तो महँगे ही होते हैं।मैं तो चाय का रेट देखता हूँ तो चाय की तलफ़ ही ख़त्म हो जाती है।

फ्लाइट में बोर्डिंग करता हूँ।अपनी साइड वाली सिट पर बैठता हूँ। पड़ोस के पैसेंजर आगे पीछे अपनी सिट बदलते हैं तो बाय लक मुझे विंडो की सिट मिल जाती हैं।

विंडो में से बाहर का नजारा देखता हूँ…धीरे धीरे छोटा होता पूरा मुंबई शहर..फिर समुंदर …और धीरे धीरे ऊपर बादलों में पहुँच जाते हैं। फिर कभी बादलों को चीरते तो कभी बादलों के ऊपर से उड़ रहे होते हैं। कभी पूरा नीला आकाश सामने होता तो कभी नीचे पूरा शहर, नदी, जंगल टॉप एंगल से अलग दिखते थे। सच में विंडो सिट का सफ़र में कुछ अपनाही मज़ा होता है। वहाँ सचमुच लगता है हम हवाई जगह में सफ़र कर रहे हैं।

बाहर देखते देखते जब आँखें थक जाती है तो विंडो की फ्लैप आधि नीचे करके सुस्ताने की कोशिश करता हूँ।फिर अचानक आँखें खुल जाती है …हो रही अनाउंसमेंट सुनकर…कैप्टन कहता है “बाहर के ख़राब मौसम के कारण सिट बेल्ट पुनः बांध लें।” मैं सतर्क हो जाता हूँ और सीट बेल्ट लगा लेता हूँ। विंडो की फ्लैप को फिरसे ऊपर करता हूँ तो कुछ सपकपा जाता हूँ…बाहर पूरा कोहरा…सामने कुछ भी नहीं दिखता सिवा धुएँ के।… और विंडो की काँच पर एक काली “मक्ख़ी”आराम बैठी थी शायद अंदर की ठंडी हवा में “सुस्ता” रही थी।

मैं समझ नहीं पा रहा था…ये “मक्खी”प्लेन में क्या कर रही है… कहाँ से आई है.. या कहाँ जा रही है यह “मक्खी?”
दिमाग़ बस “मक्खी” के बारे में सोचने लग जाता है।कभी सोचता हूँ …शायद “मक्खी” हमें हमारी औक़ात दिखा रही होगी। बता रही होगी कि “हे इंसान हमें कमजोर मत समझ… हम भी प्लेन में घूम सकते हैं…जहाँ जहाँ तुम जाओगे हम वहाँ पहुँच जाएँगे…।” या कह रही हो “हम तुमसे हरदम एक कदम आगे रहेंगे…! कारण इंसान तू दिमाग़ लगाकर हवाईजहाज़ बनाता है .. दिन रात मेहनत करके पैसे कमाता है और फिर एक दिन शौक़ के लिए या काम के सिलसिले फ्लाइट में बैठता है…और मुझे देख मैं कुछ ना करके भी एयर पोर्ट की, हवाई जहाज की सभी सिक्योरिटी सिस्टम को तोड़कर अंदर घुस सकती हूँ …इतनाही नहीं तो आराम से किसी भी विंडो की काँच पर बैठ कर बाहर और अंदर का नज़ारा देख सकती हूँ।” सच में “मक्खी” ने मेरा दिमाग़ घुमा दिया था।समझ नहीं आ रहा था “हँसु या रोऊँ?”

जोधपुर आ जाता है । बैग कलेक्ट करके तन्वी के होटल “मैरियट”पहुँच जाता हूँ।तन्वी गले मिलकर स्वागत करती है ।उसके फ़िल्म डायरेक्टर “ निखिल अडवानीजी” से भी मिलवाती है पर वो “वीआईपी मक्खी”दिमाग़ में से निकलती नहीं…! तो सोचता हूँ चलो जो दिमाग़ में घूम रहा है उसे लिख देते हैं.. शेयर कर देते हैं ताकि इस घटना से छुटकारा मिले सकें।

आप भी मुझे बता सकते हैं …यह “मक्खी हमसे क्या कह रही होगी या कह रही थी?”

है ना लाइफ इस वंडरफ़ुल?

आनंद मल्हारा
२ जूलाई२३, जलगाँव