आज १५ अगस्त … ७७ वा स्वतंत्रता दिवस। ऑफिस में सुबह संपन्न हुआ ध्वजारोहण का स्मॉल न स्वीट कार्यक्रम। कार्यक्रम पश्चात इस वर्ष पैडों के बजाय ३० फूलों के पौधे प्लांट किए। ऑफिस के सामने बनी चौपाटी की बाउंड्री वाल को सफ़ेद कलर कर वहाँ बोगन वेल लगाई ताकि परिसर में लाल, गुलाबी फ़ुल साल भर खिलते रहे।
इस साल गेस्ट के तौर पर हमने कर्मचारियों के तीन वरिष्ठ पालकों को आमंत्रित किया। उनके हाथों तिरंगा लहराया। और फिर उनसे उनके जमाने की कुछ यादें कुछ क़िस्से जाने। उसमें से एक नई जानकारी मिली…जलगाँव का टेलीग्राम ऑफिस को सन् १९९१ में पूरे भारत वर्ष में बेस्ट याने no १ का पुरस्कार मिला था… जिसके हमारे एक पालक श्री डोंगरेजी प्रमुख इंचार्ज थे।
वहाँ से मुझे एक अलग अनोखे कार्यक्रम में जाने का संजोग बना। कार्यक्रम ऑर्गन डोनर ( अवयव दाता) के सम्मान में था।कार्यक्रम के आयोजन में मल्हार से जुड़े पुराने सहयोगी भी थे तो चला गया.. वैसे उनसे मिलने की भी चाह थी।
अवयव दान के बारे में आप सभी को मालूम भी होगा जिसमें मृत्यु के बाद नेत्र दान, हृदय दान, देह दान आदि दिया जाता है और जीते जी हम अपनी एक किडनी ज़रूरत मंद को दान दे सकते हैं।
कार्यक्रम शुरू होता है । एक एक करके अवयव दाताओं को बुलाकर फ़ुल और सम्मान पत्र देकर उनका सम्मान किया जाता है।आज देश में सभी ऑर्गन्स की अति आवश्यकता है पर यह दान देने वालों की संख्या आज हमारे बीच बहुत कम है । अवयव दान बढ़े..लोगो में जागरूकता बढ़े यही इस आयोजन का मक़सद था।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि भी सेवा कार्य से जुड़े बड़े बड़े डॉक्टर्स और कार्यकर्ता थे। हर किसीने अपने विचारों से इस मोहिम की ज़रूरत और इसके बढ़ावे के लिए मौलिक सुझाव दिये जिसमें प्रमुख लगे …
# अंध श्रद्धा या हमें मिले संस्कार भी अवयव दान के लिए बहुत बार बाधा बनती है जबकि अवयव दान की प्रथा पुराण काल से चली आ रही है।
# जैसे रक्त दान करने से हम कमजोर नहीं होते वैसे ही अवयव दान करने के बाद भी हम स्वस्थ रहते हैं।
# हमने हमारे ऑर्गन कि सही देख भाल करनी चाहिए, तकलीफ़ होने पर डॉक्टर्स की सलाह लेनी चाहिये ताकि हमें दूसरे के ऑर्गन की ज़रूरत नहीं पड़े और समय आने पर हम अपना ऑर्गन दूसरों को दे सकें।
# विद्यार्थी अवयव दाता को परीक्षा में अतिरिक्त मार्क मिलने चाहिये, सर्विस में प्राधान्य मिलना चाहिये।
# अवयव दाताओं का शासन द्वारा मान सम्मान के साथ सम्मान होना चाहिये ताकि समाज को प्रेरणा मिले।
# अवयव दान और उसके ट्रांसप्लांट के लिए यहाँ के मेडिकल कॉलेज में पर्याप्त सुविधा भी बढ़नी चाहिए।
# आँखें दान देकर हम किसीको दृष्टी दे सकते हैं। देह दान करके हम अपने देह को उज्ज्वल कर सकते हैं इतनाही नहीं अवयव दान देने से हम मोक्ष द्वार के पास पहुँच जाते हैं।
कार्यक्रम देखते देखते कुछ बातें मेरे
दिल को छू गई जिसमें…
# पहली बात जीतने भी डोनर,दाता वहाँ मौजूद थे उसमें से ८०% महिलायें थी।महिलायें जिन्होंने अपने शरीर का एक अंग दूसरे को डोनेट किया था। सच में या सही मायने में महिलायें आदमी से ज़्यादा हिम्मत वाली, शक्ति शाली होती है मानना ही पड़ेगा।
# वहाँ पर एक प्रसन्न चित्त युगल बैठा था, जब उन्हें स्टेज पर बुलाया गया तब समज में आया कि उस पत्नी ने अपने पति को किडनी डोनेट की है। वो कपल खुश रहने का हक़दार भी था कारण उनके दिल के साथ शरीर भी कुछ मायनों में एक हो गया था।
# जब एक वृद्ध महिला और एक युवा का को मंच पर आमंत्रित किया जाता है…लग रहा था जैसे एक बेटा अपनी माँ को साथ ला रहा हो पर बाद में ज्ञात् होता है वे दामाद और सासु माँ होते हैं। उस सास ने अपने दामाद को किडनी डोनेट की थी। ऐसेमें अब दामाद दामाद क्या रहा होगा शायद बेटे से भी बढ़कर हो गया होगा।
# वहाँ पर एक व्यक्ति आता है जिसकी उम्र शायद ६० के क़रीब होगी जिसे उसकी माँ ने क़रीब २५ साल पहले किडनी डोनेट की थी। बिलकुल तंदुरुस्त था और वो बताता है कि उसकी माँ ८५ की उम्र में आज भी मस्त है, फिट है।
# एक अनोखा कपल आता है जिसने उनकी ६ साल की बेटी के किसी एक्सीडेंट में मौत हो जाती है, पर वे उसकी आँखें डोनेट करना नहीं चूकते । कह रहे थे मुझे भी किसने ऐसे ही कठिन परिस्थिति में मदद की थी तो मैं कैसे पीछे हटता।
# एक और बात ध्यान में आई जैसे किसी घर में या परिवार के किसी एक ने अवयव या देह दान किया हो …फिर उस परिवार की वह श्रृंखला बन जाती है। चलती रहती है और उस परिवार में आपसी प्यार के धागे मज़बूत होते रहते हैं। बस शुरू होने कि देर है।
बैठे बैठे मैंने सोच लिया उस ख़ुशनुमा किडनी ट्रांस्प्लांट वाले “कपल” को और उस “दामाद और सास” की जोड़ी को अपने “हॉबी डूबी डू” के प्लेटफार्म पर बुलाकर आप सभी से मिलवाएँगे और जानेंगे अवयव दान की ख़ुशी क्या होती है।
जब दिख रहा था कि ऑर्गन डोनेट करने के बाद आपसी प्रेम बढ़ता है तो वहाँ बैठे बैठे एक और विचार दिमाग़ में शोर मचाने लगा …
सोचने लगा क्यों ना ब्लड डोनेशन करते वक़्त हम कहे की मेरा खून मुस्लिम पेशेंट को दे और मुस्लिम व्यक्ति यह कहे मेरा खून ज़रूरतमंद हिंदू को … शायद इससे भी दोनों समुदाय में थोड़ा भाईचारा बढ़े…प्यार बढ़े। कारण एक का खून दूसरे में जायेगा तो अपनापन तो बढ़ेगा ही।
यह विचार इसलिए भी आ रहा था कि मुख्य अतिथि में रेड क्रॉस के प्रतिनिधि भी थे और दूसरा कारण न्यूज़ चैनल देखो, ग़दर २ देखो या वाघा बॉर्डर की परेड हर जगह अहंकार, नफ़रत ही नफ़रत दिखती है, दिखाते हैं। और हम भी ख़ुशी ख़ुशी उसे देखते हैं।
सच मानो अवयव दान को श्रेष्ठ दान कहा गया है। फिर भी बहुत कम भाग्यशाली होते हैं जो इसका लाभ उठा पाते हैं।
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है ना लाईफ़इस ब्यूटीफ़ुल…!
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आनंद मल्हारा
१५ अगस्त २०२३, जलगाँव
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For more info on organ donation one can call
Dr Amit 7722008658
Kishor. 9922100500
Dr Narendra 9823137938
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