रोमांचकारी स्कैंडल “टोल टैक्स” की चोरी का… हमारी राजस्थान की “रोड सफर” का। भाग १..

रोमांचकारी स्कैंडल “टोल टैक्स” की चोरी का… हमारी राजस्थान की “रोड सफर” का। भाग १..

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दो दिन से सोच रहा हूं …राजस्थान “रोड सफर” में “टोल टैक्स” द्वारा बचे १०००_१५०० रुपए का क्या करू? किसे वो पैसे लौटा दू ताकि थोड़ी रोमांचक “बेईमानी” करके बचाए गए वो पैसों का “कर्जा”उतार पाऊं।
आप सोच रहे होंगे यह क्या लिख रहा है “आनंद”। पर यह सच है। हमने राजस्थान जाते वक्त और आते वक्त टोल के पैसे नहीं दिए और करीब डेढ़ हजार तक के पैसे बचा लिए। अब आप पूछोगे कैसे ?

तो हुआ यूं ..हमने बाहर गांव के एक परिचित की दस दिन पुरानी “नई गाड़ी” को बुक किया हमारी “उदयपुर की रोड ट्रिप” के लिए। गाड़ी भी रूबाबदार थी, एसयूवी का नया लेटेस्ट मॉडल था। ड्राइवर भी अनुभवी, सुलझा हुआ था। गाड़ी को साफ और उसे सदा चमका कर रखता था।

सफर शुरू हुआ। मैं आगे बैठा था, पीछे परिवार के अन्य सदस्य। गाड़ी के अंदर आगे के डैश बोर्ड पर गणेशजी की मूर्ति लगी थी। उसके पीछे “इंडिया” के दो छोटे छोटे फ्लैग क्रॉस में लगे थे जो बाहर से भी दिखते थे।

पहला टोल नाका आता है। ड्राइवर टोल की लेन में जाकर धीरे धीरे गाड़ी आगे बढ़ता है। एक दो बार हॉर्न देता है। टोल की विंडो आने के पहले थोड़ा रुक जाता है। फिर हॉर्न बजाता है। टोल विंडो वाला ऑपरेटर हाथ देकर गाड़ी को आगे आने को कहता है। दो तीन सेकंड में गेट का बार उपर उठ जाता है और हम आगे निकल जाते हैं। मुझे लगा गाड़ी के “फास्ट टैग” को टोल के “कैमरा” ने रीड कर लिया होगा।

गाड़ी आगे निकलती है…सफर फिर से शुरू हो जाता है। मौसम अच्छा था, गाड़ी भी नई, गाड़ी में मस्त fm बज रहा था। बेगम साहिबा, बेटी, दामाद और दोहिता पीछे बैठ गप लड़ा रहे थे। हंस रहे थे तो कोई गा रहा था।

डेढ़ दो घंटे बाद एक छोटा “मैन्युअल टोल नाका” आता है। हमारी गाड़ी उसी तरीके से आगे बढ़ती है। टोल की विंडो आने के पहले दो बार हल्का हॉर्न ड्राइवर बजता है। टोल वाला व्यक्ति हमें और गाड़ी को देखता है और तुरंत पास बैठे व्यक्ति को बार उठाने को कहता है । जैसे ही हमारी गाड़ी विंडो को क्रॉस करती है विंडो वाला व्यक्ति हमें “सैल्यूट” करता है। मैं अचंभीत हो जाता हूं, थोड़ी छाती फुल जाती है। सोचता हूं यह गाड़ी का इंप्रेशन है या मेरे व्यक्तित्व का? वैसेभी मेरे अनेक परिचित, अपरिचीत मुझे “स्टीव जॉब्स” जैसा कहते हैं। हो सकता हो वो स्टीव जॉब्स का “फैन” रहा हो।

गाड़ी फिर अपने रास्ते लग जाती है। रफ्तार से अपने लक्ष्य की और अग्रेसर होती रहती है। मैं सहज ड्राइवर को पूछता हूं “अरे भाई गाड़ी को तेज भगाओ, देखें क्या स्पीड तक जाती है”। कारण मैं तो गाड़ी ८०१०० के उपर चलाता ही नहीं। वह बता रहा था.. अपना दर्द बयां कर रहा था.. कह रहा था “साब अब रास्ते में “स्पीडो मीटर” लगे होते हैं, “आरटीओ” वाले छुप कर कैमरा लगाए गाड़ी में बैठे होते हैं और गाड़ी ८० के उपर कैच हुई तो ऑटोमैटिक १००० रुपए का फाइन का चलान अपुन को मिल जाता है.. बहुत संभालकर स्पीड को बढ़ाना पड़ता है”। उसने एक दो आरटीओ की कोने में खड़ी गाड़ी भी बताई जिसमें कैमरे लगे थे। हमारा ड्राइवर चतुर था। ऐसी गाड़ी दिखने पर वो पहले ही गाड़ी की रफ्तार ७०७५ तक कर देता था।

एमपी बॉर्डर पर पुनः एक बड़ा टोल नाका आता है। जहां पर जाने के लिए करीब ५_६ लेन्स थी। हम जिस लेन में आगे आते हैं, एक दो बार हॉर्न भी बजाते हैं पर पाते हैं .. टोल के इंडिकेटर आदि शुरू थे पर टोल की विंडो में कोई ऑपरेटर नहीं बैठा था। हमारा ड्राइवर पुनः गाड़ी को रिवर्स लेता है और फिर से दूसरी लेन में आकर आगे बढ़ता है। गाड़ी की स्पीड कम करता है, विंडो आने के पहले रुक जाता है। दो बार हॉर्न बजाता है। विंडो का ऑपरेटर हमें या हमारी गाड़ी को उपर से नीचे देखता है। हमें आगे बुलाता है और इशारे से कुछ पूछता है। तब पहली बार हमारे “उस्ताद ड्राइवर” विंडो के मिरर को बटन दबा नीचे करता है।

ऑपरेटर हमें देखकर पूछता है “कुछ कार्ड है?” हमारा ड्राइवर एटीट्यूड के साथ कहता है “साब की फैमिली है”। पर वो पुनः कार्ड की मांग करता है तो ड्राइवर नरमाई से कहता है “अरे भाई, कार्ड तो साब के पास होता है… साब ड्यूटी पर है.. थोड़ा एडजस्ट कर लो” ।
विंडो का ऑपरेटर हमें एक बार फिर से आंखे फाड़ कर देखता है और गेट को खोल देता है। “बार” उपर उठ जाता है और हम आगे निकल जाते हैं।

मैं सपके में आ जाता हूं। ड्राइवर को पूछता हूं “यह क्या माजरा है? कौन साब, किसकी फैमिली? यह टोल का क्या चक्कर है?” वह ड्राइवर हंसते हंसते कहता है “साब ये स्पेशल गाड़ी गवर्नमेंट के ………डिपार्टमेंट में लगी है। उनके साब ही इस गाड़ी में सफर करते हैं। आपने पढ़ा नहीं क्या गाड़ी के नेम प्लेट पर क्या लिखा है?” “ठीक से नहीं” मैंने कहा।

आगे रास्ते में खाने के लिए “मक्खन da ढाबा” पर रुकते हैं। गाड़ी से उतरते वक्त गाड़ी के आगे आकर उसे ठीक से देखता हूं। फिर पीछे जाकर देखता हूं तो समज में आता है टोल वाले क्यों सैल्यूट मार रहे थे। क्यों टोल वाले हमारी गाड़ी को पैनी आंखो से देखते थे।

क्रमशः

है ना लाइफ इस मजेदार!

आनंद मल्हारा
२६ जनवरी २२, जलगांव