हो सकता है आप को उत्सुकता होगी उस स्पेशल गाड़ी पर क्या लिखा था…तो गाड़ी के आगे ग्लास पर ‘भारत सरकार’, पीछे के ग्लास पर ‘भारत सरकार’ का स्टीकर लगा था .. नंबर प्लेट पर ‘….डिपार्टमेंट’ का नाम. गाड़ी के बोनेट पर आगे की ओर एक ब्रास का रोड लगा था जैसा किसी मंत्री या कलेक्टर की गाड़ी पर लगा दीखता है.
हम सब ‘मक्खन डा ढाबा’ मेँ जाते हैं , वहां की फेमस सरसों दा साग और मक्की की रोटी आर्डर करते हैं. वहां रोटी पर बटर माँगा तो वो बटर नहीं नहीँ ‘मक्कन’ देते हैं. खाने के अंत में टेबल पर पड़ी बाल्टी में से छास निकाल उसे पीकर निकलते हैं. और है वहां छाछ के पैसे नहीं लेते. हम ड्राइवर उस्ताद का विशेष ध्यान रखते हैं. उसकी चतुराई पर हमें गर्व जो था.
फिरसे हमारा सफर शुरू होता है…एक और टोल के बोर्ड दिखने शुरू होते है. फिरसे ड्राइवर की वही स्टाइल. टोल की खिड़की तक पहुँच जाते हैं. ऑपरेटर हमें कार्ड मांगता है … हम वही सब नुस्के आजमाते हैं. पर वो मानता नहीं, वो उसके सीनियर को बुलाता है. वो ड्राइवर से बात करता है पर वो ‘कार्ड’ पर या ‘0 फ़ास्ट टैग’ की डिमांड करता है जो अक्सर कुछ govt ऑफिसर्स को सरकार द्वारा दिए जाते हैं. अंत में ड्राइवर कहता है ‘ठीक है चलो, फ़ास्ट टैग चलेगा ना? और अंदर से ‘फ़ास्ट टैग’ निकाल कर ग्लास पर लगाता है… कैमरा उसे स्कैन करता है और हम ‘पहली बार’ टैक्स भरकर आगे निकलते हैं.
धीरे धीरे शाम होने लगती है…अँधेरा छाने लगता है. रास्ते में निम्बाहेड़ा के पास के ‘सावलियाजी’ के मंदिर में जाते हैं .. श्रीमतीजीने बरसों पहले यहीं कुछ ‘मन्नत’ मांगी थी…इसलिए बेटीऔर दामाद को
लेकर दर्शन करते हैं. दामाद भी पहली बार किसी मंदिर में दर्शन करने हमारे साथ आये होते हैं. दामाद जी दर्शन करने के बाद सासुमां को कहते हैं ‘मां, अगली बार कहीं हमारे लिए मन्नत मांगोगे तो ‘भारत’ के नहीं किसी ‘परदेश’ के मंदिर में मांगना ताकि आपके साथ हमें वहां जानेको मिले. सुनकर हम सब हंसने लग जाते हैं.
वैसे सांवलियाजी ‘कृष्ण’ का मंदिर था. हाल में उसका बड़ा विस्तारीकरण हुआ था…पहले तो श्रीमतीजीको भरोसा ही नहीं हुआ कि ये वही मंदिर है जहां हमने या उसने मन्नत मांगी थी. फिर पूछ ताछ की तो भरोसा हुआ कि मूर्ति वही है…मंदिर वही है… केवल परिवेश नया है ,विशाल है.
कहते है…वो मंदिर ‘दो नम्बरवालो’ का ख़ास है. ‘अफीम’ की बेनामी खेती करने वालों का वो रखवाला है. खेती में किसानों को अफीम की खेती से जो मुनाफा होता है, आधा मुनाफा वे मंदिर में चढ़ा देते हैं…किसान भी धनवान…मंदिर भी धनवान.
रास्ते में ‘मंगलवाड़’ की फेमस ‘दाल बाटी’ खाते हुए हम उदयपुर का रास्ता पकड़ते हैं . थोड़ी दूर आगे एक छोटा ‘टोल गेट’ आता है, रात का समय था. आजु बाजु में अँधेरा. जैसे ही हम टोल के करीब पहुँचते है गाड़ी में से हॉर्न की नहीं सायरन की आवाज प्रकट होती है ! ड्राइवर उस्ताद आपकी बार अपना नया हथियार आजमाता है सायरन बजाता है … सायरन ki आवाज सुन टोल का ऑपरेटर जगह से हिल जाता है… उठ जाता है और गाड़ी को ठीक से देखकर फटाक से रोड को साइड में कर देता है और हमें आगे जाने हाथ देता है. हम आगे निकल जाते हैं.
मैं अंदर ही अंदर उस टैक्सी के मालिक और उस ड्राइवर की होशियारी को नमन करता हूँ. उन्होंने टोल बचाने के हर नुस्के को अपने पास संभाल कर रखा था.
उदयपुर पहुँचते पहुँचते एक और टोल लगता है, इस बार टोल पर ‘महिला ऑपरेटर’ होती है…वो भी कार्ड की मांग करती है, हमारा ड्राइवर ज्यादा कोशिश न कर वहां ‘फ़ास्ट टैग’ दिखा कर आगे बढ़ लेता है. मैं सहज पूछता हूँ ‘बहुत जल्दी हर मन ली?’ वो कहता है ‘मैं औरतों से पंगा नहीं लेता .. लेडीज बहुत खिटपिट करती है.’
दूसरे दिन हम शादी निपटा कर हमारे गांव ‘कानोड़’ पहुँचते है करीब शाम 5 बजे. गांव के रस्ते संकड़े होने की वजह से हम मेन मार्केट में गाड़ी लगा देते हैं. हमारी गाड़ी को देख रास्ते पर खड़े व्यापारियों में खुसर पुसर शुरू हो जाती है. कुछ लोग तिरछी नज़र से गाड़ी की ‘नेम प्लेट’ पढ़ कर आगे निकल जाते है. उन्हें लगता है…निश्चित ही कोई इन्क्वायरी या रेड डालने आइ है यह गाड़ी. पहले मैं उतरताहूं तो लोगों का शक और गहरा होता दिखाई देता है …शायद मेरी ‘खड़ूस’ पर्सनालिटी का असर हो … सर पर बाल नहीं और चेहरे पर हंसी नहीं..सही भी लगता था कारण रास्ते में मैंने दामाद जी को आगे बैठने कहा था तब वे भी बोले थे ‘पापा आप ही बैठे तो टोल पर टैक्स नहीं लगेगा…यदि हम बच्चों को आगे की सीट पर देखेंगे तो हर कोई टैक्स वसूलेगा.
पर जब श्रीमतीजी गाड़ी से उतरती है तो कुछ लोग उन्हें पहचान लेते हैं…उनके चेहरे नार्मल हो जाते हैं और कह उठते हैं ‘अरे कोई नि या तो ‘धींग साब’ री छोरी है… ‘नल्लूजी’ जीरो जलगाव ब्यांव हुयो’.
दूसरे दिन जल्दी सुबह के समय में हम जलगाव की और निकलते हैं , फिरसे वही toll टोरी. वही सब नुस्खे …पर आते वक़्त सायरन का ज्यादा इस्तेमाल करते … Toll बचाते सही सलामत जलगाव पहुँच जाते हैं . घर पहुँचने पर मैं उस ड्राइवर को 500 की टिप देता हूँ … बक्षीश देता हूँ …जो शायद ही मैंने कभी किसी ड्राइवर को दीया हो…
कारण साफ था …हम उस ड्राइवर के आर्ट से, उसकी स्टाइल से हम प्रभावित हो चुके थे और उसने 1000-1500 तक के पैसे भी बचाये थे साथ में जर्नी को मजेदार थोड़ा एक्ससिटिंग जो बनाया था,
ड्राइवर को जाते जाते एक नुस्खा मैं भी दे देता हूँ … कहता हूँ तुम “वाइट ड्रेस और एक कैप क्यों नहीं पहनते? तुम्हारा और गाडीका रुबाब और बढ़ जायेगा”. वो भी हंस देता है…हंसकर कहता है” क्या साब आप भी ?”
खेद है ,अभी तक वो बचे पैसे को सही जगह डोनेट नहीं पाया हूँ …
समाप्त..
है न लाइफ इस मजेदार!
आनंद मल्हारा
जलगाव, 31 दिसम्बर 2022


