पोर्ट ब्लेअर का ‘सेल्यूलर जेल’ क्रूरता और देशभक्ति का अनोखा दर्शन

पोर्ट ब्लेअर का ‘सेल्यूलर जेल’ क्रूरता और देशभक्ति का अनोखा दर्शन

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भाग ३

हम सुबह १०.३० बजे पोर्ट ब्लेयर लैंड हो जाते हैं। एयर पोर्ट से टूर ऑपरेटर हमें सीधा नाश्ता कराके सेल्यूलर जेल ले जाता है।
टूर का एक दिन कम जो हो गया था।

बाहर से जेल की भव्यता कम समज में आती है। अंदर जाते हैं और गाइड से जुड़ते हैं तो इस जेल की खूबियाँ समझमें आती है।
जब हमारे क्रांतिकारी अंग्रेजों के ख़िलाफ़ ज़्यादा उग्र हो गये थे तब अंग्रेजों ने इस जेल का निर्माण किया, देश से दूर…समुद्र के बीच। जो भी क्रांतिकारी उनके लिए परेशानी बनता उन्हें वे काले पानी की सजा काटने इस जेल में भेज देते। ताकि उसकी आवाज़ दब जाये, उसी तक रहे।

जेल की रचना अभूतपूर्व थी। कैदियों की मानसिकता, उनकी हर बग़ावत को ध्यान में रखते जेल का निर्माण किया गया था। जेल के तीनों बाजू समुद्र और सामने पूरी सुरक्षा ताकि कोई भी क़ैदी भागने का सपने में भी सोच नहीं पाये। चार विंग्स के इस जेल की रचना ऐसे थी कि एक विंग के क़ैदी दूसरे विंग के कैदी को देख ना सके। कहते है वीर सावरकर और उनके भाई दामोदर सावरकर दोनों इसी जेल में होते हुए भी २ साल तक उन्हें मालूम नहीं था दोनों एक ही जेल में हैं।

क्रांतिकारियों को दंड देने , उनकी हिम्मत तोड़ने के हर उपाय वहाँ मौजूद थे। इस जेल का निर्माण भी इन्हीं क्रांतिकारी कैदियों को यातना देकर करवाया गया था। रोज़ हर क़ैदी को नारियल को छीलना और उसका घानी में जुतकर १८ किलो तेल निकालना होता जो की असंभव होता।जो उतना कर नहीं पाता उन्हें बेड़ियों से जकड़ा जाता , कोड़ो से मारा जाता, जब तक वे बेहोश नहीं हो जाते। स्नान करने समुद्र का खारा पानी दिया जाता जिससे ज़ख़्म और जलें। दिन में केवल एक लोठा पानी, लोहे की प्लेट में गरम गरम खाना दिया जाता।इतना गर्म की खाया नहीं जाये और ठंडा होते होते ख़राब हो जाए।

“मृत्यु दंड” वाले क़ैदियों को उनकी आख़िरी इच्छा तो पूछी जाती पर फाँसी देने के बाद अक्सर लाश को समुद्र में फैंकी जाती।क्रांतिकारियों को दंडित करने का उनपर जुल्म करने का काम हमारे ही क्रूर डकैती,खूनी या चोर ऐसे लोगों को दिया जाता।

दाद देनी पड़ेगी हमारे क्रांतिकारियोंकी जिन्होंने इतनी यातना सहन करने के बाद भी अंग्रेजों के सामने सर झुकाया नहीं , यातना सहन की पर “भारत माता की जय” का नारा गाते रहे और अंत में अंग्रेजों को सब क्रांतिकारियों को देश भेजना पड़ा।

वहाँ रहे क्रान्तिकरियोंकी क़ुर्बानी की कहानी सुनने के बाद.. उनके पदस्पर्श से पावन हुई उस सेल्यूलर जेल को या कहो स्वतंत्रता के उस मंदिर को देखने के बाद उस जगह के आगे हर भारत वासी नतमस्तक हो ही जाते हैं।

वहाँ एक प्रदर्शनी भी है जिसमें वहाँ रहे, सजा काटे क्रांतिकारियों की जानकारी अंकित है।अनेकों ने वहाँ आत्मचारित्र लिखा है , कविताएँ लिखी है, साहित्य रचा है, किसी ने वहाँ का अनुभव बयान किया है जिसे पढ़कर दिल दहल जाता है।

वहाँ शाम को एक लेज़र शो भी दिखाया जाता है जिसमें पूरे सेल्यूलर जेल की आत्मकथा सुनाई और दर्शाई जाती है जो आज यू ट्यूब पर भी उपलब्ध है .. ज़रूर देखे।

चलो थोड़ा फिरसे पीछे जाते हैं। एयर इंडिया की बारात में । एयर इंडिया ने जो हमारी ख़ातिरदारी की तो मुझे याद आता है हमारा हनीमून , हम ठंड में जनवरी में कश्मीर जाते है..।पहली बार हवाई जहाज़ में बैठते है.. औरंगाबाद से दिल्ली और फिर दिल्ली से श्रीनगर ऐसा कनेक्टिंग फ्लाइट था। जब दिल्ली पहुँचते है तो आगे ख़राब वेदर के कारण श्रीनगर की फ्लाइट कैंसिल हो जाती है और तब एयर लाईनस की और से रात को रुकने “होटल सेंटोर” ५ तारांकित में रुकने का मौक़ा मिलता है।लाइफ का पहला हवाई सफ़र और फ्री में मिला पहला फाइव स्टार होटल में रहने का अनुभव वो भी हनीमून के वक़्त।

इस अंडमान की ट्रिप के पहले मुझे काम से चेन्नई जाना था। मैंने इसका ज़िक्र घर में भी किया था। जब अंडमान के टिकट बुक होते हैं तब एक ख़याल मन में आया कि क्यों ना मैं एक दिन पहले चला जाउ, चेन्नई का काम निपटा कर चेन्नई से फ़ैमिली को जॉइन हो जाऊँ?बाद में सोचा नहीं फैमिली ट्रिप है साथ में ही जाएँगे। पर क़िस्मत देखो … हमें क़िस्मत चेन्नई शाम को छोड़ती है और सबको मजबूरी में वहाँ रात को रहना पड़ता है .. पर मुझे वक़्त मिल जाता है, मैं शाम को पार्टी को मिलने चले जाता हूँ काम कर के रात को फिरसे होटल पहुँच जाता हुँ।

क़िस्मत कब क्या गुल खिलाएगी मालूम नहीं। मेरे चेन्नई का एक लंबा चक्कर बचा देती है।

जब होटल पहुँचता हूँ तब बीबी मेरे तरफ़ अलग नज़र देखती है और तनय को कहती है “अब मैं तेरे पापा केसाथ में अकेले कहीं घूमने नहीं जाऊँगी … वो कहाँ भी, कभी भी अकेले छोड़ देते हैं…अब डर लगता है उनके साथ घूमने। तनय भी मेरी और देखता है उलझन में पड जाता है किसे क्या कहे!

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है ना लाइफ फुल ऑफ़ सरप्राइज और खूबसूरत!

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आनंद मल्हारा
२२/१०/२३, जलगाँव
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