भाग ३..
वैसे फ़ुक़ेत फेमस है वहाँ के क्रिस्टल क्लियर समुद्र किनारों के लिए। वहाँ ज़्यादातर सैलानी अलग अलग देशों से समुंदर में नहाने या नेचर को जीने आये होते हैं। वे दो चार दिन नहीं महीनों महीनों के लिए आते हैं। हम इंडियनस ही शायद ऐसे होते होंगे जो दो दो दिन में एक देश देख कर दूसरे देश देखने पहुँच जाते हैं।और जीवन भर पड़ोसी को फ़क्र से कहते हैं …फ़लाँ फ़लाँ कंट्री हम घूम लिए हैं। इंडियंस वैसे फ़ुक़ेत में काफ़ी कम ही दिखे।
रोज़ाना हम अलग अलग बीच पर स्पीड बोट से जाते। वैसे परदेसी महिला पुरुष सभी कम से कम कपड़ों में घूमते नज़र आते और जो हमारे जैसे हिंदुस्तान से आये होते हैं वे भी उनकी देखा देख कर छोटे कपड़ों में घूमते नज़र आते। परदेस की बूढ़ी औरत भी होगी तो वो भी हाफ चड्डी में होगी। इण्डिया से आये नये नये शादी शुदा कपल भी दिखते। उनके हाथों पर लगी मेहंदी भी दिखती और बाक़ी रहता पूरा वेस्टर्न लुक। किसीके हाथों में रंगीन चूड़ियाँ होंगी पर पहनावा पूरा वेस्टर्न। माँग में सिंदूर भी होगा और पहना होगा स्विम सूट ।
हमारी श्रीमतीजी थोड़े ही पीछे रहती। वो भी पूरी तैयारी कर के ही आई थी। तन्वी से कुछ कपड़े लिये थे। तो कुछ मैंने ही ख़रीद कर दिये थे। हम जब माँaya bay बीच पर गये थे और एक वहाँ निकाला हुआ फोटो फ़ैमिली में शेयर किया था । फोटो भी अच्छा क्लिक किया था एक फोरेनरने। नसीब से वो एक ही फोटो शेयर किया था जिसमें श्रीमतीजीने ने शोर्ट और स्मॉल कुरती पहनी थी। पैर खुले थे। फोटो देखकर घर के बड़े-छोटे थोड़े सपकपा गये। घर में उस पर दबे मुँह चर्चा भी हुई हो। दूसरे दिन छोटी देरानी का मैडम को फ़ोन आता है , इधर उधर की बातें होती है , फिर कहती है “नल्लू भाभी, जो जो कपड़े ले के गये ना सब पहनों, सब शौक़ पूरे करो, ऐसे कपड़े वहाँ ही पहन सकते हैं हम लोग।” कपड़े जेठानी ने पहने खुश देरानी हो रही थी।
सही भी है…अब उन्हें भी लाइसेंस जो मिल गया था छोटे कपड़े पहनने का।
सही है… हमारे यहाँ पुरुष प्रधान संस्कृति में आज भी औरतों को पूरे कपड़े पहने रखना एक सभ्य संस्कार माना जाता है। यहीं संस्कार उनके लिए एक बंधन बन जाता है ।और बंधन से मुक्त होने की चाह किसे नहीं होती? वैसेभी आज की नई युवा पीढ़ी इस संस्कार को तोड़ – मरोड़ रही है। ज़रूरत है अब हमें अपनी नज़र सुधारने की। हमारे घर को ही ले लो ..तन्नु ने बचपन से आज तक जितनी फुल पेंट पहनी होगी उससे कई गुना ज़्यादा शॉर्ट्स ही पहने होंगे। ख़ैर..
स्पीड बोट जब हमें एक छोर से दूसरे छोर तक ले जाती तब सफ़र में बहुत मज़ा आता। बोट समुद्र की लहरों को काटती हुई , उन्हें चीरते हुए आगे बढ़ती रहती, कुछ वक़्त के लिए लगता जैसे मानव निर्मित बोट लहरों के दो भाग कर देगी।लेकिन कुछ ही पलों के बाद लहरें फिरसे मिल जाती, एक हो जाती और अपना बहने का काम शुरू कर देती।समुद्र का विशाल रूप सामने आ जाता।
सही है निसर्ग के सामने हमारा अस्तित्व भी कुछ ऐसा ही क्षणिक है । हमें लगता है हम कुछ ख़ास हैं, ग्रेट हैं पर निसर्ग के सामने कुछ नहीं।
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क्रमशः भाग ४
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है ना लाइफ इस फुल ऑफ़ लाईफ़?
आनंद मल्हारा,
६-१-२४, जलगाँव
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