Part 4 : हम भारतीयों के flexibility के  क्या कहने !

Part 4 : हम भारतीयों के flexibility के क्या कहने !

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भाग ४

फ़ुकेट से हम बैंकॉक होते पट्टाया पहुँचे। हर जगह वक़्त पर ड्राइवर हाज़िर हो जाता । ज़्यादातर ड्राइवर को ना तो हिन्दी समझती ना इंगलिश । पर उनसे बात ज़रूर होती, बात होती मोबाइल की मदद से , मोबाइल के अंदर के ट्रांसलेटर app के ज़रिए। वो हमें “इंगलिश” में बोलने को कहता app उसे उनकी “थाई” भाषा में ट्रांसलेट करता, वो उसे पढ़ते फिर वो थाई में कुछ बोलते, app उसे इंगलिश करता और वो ड्राइवर मोबाइल का स्क्रीन हमें बताता। ऐसे चलती बातें। उनकी गाड़ियों का स्टैण्डर्ड, ड्राइवर का स्टैण्डर्ड, रहन सहन हमारे यहाँ के ड्राइवर से ज़्यादा समृद्ध लगा। हेड फ़ोन से लगातार वे किससे बात करते होते।

हाईवे पर ५-६ km के अंतर पर “पार्किंग स्टेशन” दिखे जहाँ ड्राइवर रुक जाते। रेस्ट करते। वहाँ सब चीजों की उपलब्धता रहती। वहाँ भी “लिकरका” विज्ञापन इनडायरेक्ट वे में ही करते दिखी। जैसे “जानी वॉकर वॉटर।”

हम वहाँ “बिग बुद्धा” का मंदिर देखने गये। शंका थी पर जाने के बाद समझ में आया कि मंदिर में महिलायें शॉर्ट्स और स्लीव लेस पहनकर नहीं जा सकती। और वहाँ आने वाले ज़्यादातर टूरिस्ट शॉर्ट्स में ही होते। तो वहाँ मंदिर के गेट पर ही एक कपड़े का स्टॉल लगा था जहाँ १५० भात में छोटी लूँगी टाइप कपड़ा और १०० भाट में बाहें छुपाने छोटा कपड़ा मिल रहा था। हमारी श्रीमातीजीने भी शोर्ट ही पहना था। छोटे कपड़े के टुकड़े के लिए १५० भाट याने क़रीब ₹ ४००/- खर्च करने में वैसे हम दोनों को अखर रहा था। पर मजबूरी थी, कपड़ा ख़रीदा। ऊपर जाकर मूर्ति देखी, उसे वंदन किया। मैडम ने तो थोड़ा वहाँ बैठकर ध्यान भी कर लिया।

मंदिर देख नीचे आने लगे। फिर से उसी जगह पर पहुँचे जहाँ से कपड़ा ख़रीदा था। वहाँ वैसी ही गर्दी थी जैसे पहले थी। मंदिर कुछ ही समय में बंद होने को था। मैंने श्रीमतीजी को कहा “ये कपड़ा अब अपने किस काम का ? इसे किसी एक को दे दे ताकि उसके पैसे बच जाये।” पर मैडम के दिमाग़ में कुछ और ही चल रहा था। बोली “ठहरो, मैं इसे किसी यात्री को डिस्काउंट प्राइस में बेच कर ही आती हुँ।”और वो आगे निकल गई जहाँ टूरिस्ट गाड़ियों से उतर रहे थे। उसने एक महिला टूरिस्ट से बात की, उसे इंगलिश में इसकी ज़रूरत समझाई और कहा कि १५० का कपड़ा १२५ में ले लो।वो भी मान गई। कपड़ा दिया और उनसे १२५ भाट लिए।श्रीमतीजी विजयी भाव लिए हँसते हुए मेरे तरफ़ आई। १२५ भाट मुझे गर्व के साथ बतायें। पर वो पैसे पाकर हम दोनों बहुत हँसे।बहुत देर तक हँसते रहे। आज भी क़िस्सा याद आता है तो हँसी आती है। पर ऐसा काम कोई इंडियन ही कर सकता है यह मेरा ठोस विश्वास है। वैसेभी हमारी मैडम ग्रेट है, दिखती अंग्रेज है पर दिमाग़ हिंदुस्तानी है।

वैसे भी हम हिंदुस्तानी काफ़ी फ्लेक्सिबल होते हैं। वक़्त के अनुसार, परिस्थिति के अनुसार जल्दी ढल जाते हैं। थाईलैण्ड में छोटा सब्ज़ी वाला बोलो या कोई दुकान वाला नो बारगेनिंग। हम कोशिश ज़रूर करते पर सफलता नहीं मिलती। दिल ही दिल में बिबीजिको इसकी काफ़ी तकलीफ़ भी हुई। कर भी क्या सकते थे? मैं समझ रहा था उनका दुःख। एक बार मैंने सोचा भी कि फल वाले को बोलू की तुम बीबीजी को पहले ज़्यादा रेट बताओ फिर कम कर देना…पर उन्हें समझाए कैसे ? उन्हें ना तो हिन्दी आती ना ही इंग्लिश !

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क्रमशः भाग ५
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है ना इंडियंस की flexibility ग्रेट?
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आनंद मल्हारा
६/१/२४, जलगाँव
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