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पिछले एक सप्ताह से घर के क़रीब रोड पर स्थित एक छोटे सुंदर मंदिर का जीर्णोद्धार हो रहा था। रोड डिवाइडर के स्टार्ट पॉइंट पर वह स्थित था। सुबह रोज़ाना वहाँ से गुजरना होता है तो देख रहा था। फटाफट सुंदर मार्बल का कार्विंग के साथ मंदिर बन गया। देखते देखते मंदिर के आगे लोकसेवक के नामों का एक बोर्ड भी लग गया जिसके प्रयत्नों से वह रास्ता बना था, जो पहले नहीं था। पर उसका भी एक लाभ है , वह बोर्ड अब मंदिर का रक्षक बन गया है। कुछ भी अनहोनी होती है तो वो सेनापति के भाँति सामने खड़ा है।
उसी प्रकार midc रोड पर भी कुछ दिन पहले एक मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ था वह भी रोड के कॉर्नर के स्टार्ट पॉइंट पर ही था।
अनेकों जगह रास्ते के स्टार्ट पॉइंट पर, डिवाइडर पर ऐसे मंदिर होते हैं, बनते हैं और फिर कुछ सालों बाद उसका जीर्णोद्धार भी होता है। जीर्णोद्धार के वक़्त कभी कभी वो पहले से थोडी ज़्यादा जगह घेर लेता है। फैल जाता है।मंदिर है, लोगों की श्रद्धा का विषय है तो कोई ज़्यादा बोलता भी नहीं।
फिर सोचता हूँ क्या यह एक मंदिर उधर से गुजरने वाले हर व्यक्ति को अपना सा लगेगा? क्या हर व्यक्ति वहाँ श्रद्धासे सर झुकायेगा? अपने देश में भगवान भी तो बहुत है। हर संप्रदाय के अपने अलग भगवान। या कहो जिस एरिया में जिसकी मेजोरिटी उनका वहाँ मंदिर। क्या ऐसे मंदिर ट्रैफ़िक की तकलीफ़ नहीं बढ़ाएँगे? अच्छी बस्ती में आज हर घर एक नहीं तो दो दो गाड़ियाँ दिखती है , रास्ते पर गाड़ियाँ खड़ी होती है।
वैसे मंदिर के फ़ायदे भी बहुत है,
आस पास के लोग वहाँ अपने देवता के दर्शन लेते हैं, मानसिक शांति का अनुभव करते हैं।मंदिर और थोड़े आस पास का परिसर साफ़ रहता है। हमारे शिवाजी उद्यान में भी एक कुँवे के पास मंदिर है, मंदिर के आस पास सफ़ाई हो जाती है और बाक़ी जगह गंधगी ही गन्धगी। ट्रैफ़िक की भेलेही वहाँ थोड़ी दिक़्क़त बढ़े पर वहाँ शायद एक्सीडेंट कम हो जाते हैं कारण मंदिर स्पीड ब्रेकर का काम करता है। लोग संभल जाते हैं, स्पीड कम कर देते हैं। पर क्या भगवान सचमुच रास्ते पर चाहिये? क्या उन्हें हम हमारे घर में, दिल में नहीं रख सकते ?
एक डरावना ख़याल आता है यदि गलती से किसी बड़ी गाड़ी का मंदिर से टकराव हो गया तो? मंदिर टूट गया तो? और गाड़ी चालक यदि दूसरे संप्रदाय का हो तो ? तो क्या क्या हो सकता है?
मैं जब मुंबई में पढ़ता था तो मेरे दोस्त के घर ‘चींचपोकली’ की एक चाल में जाया करता था। उसका घर तीसरी मंज़िल पर था, लिफ्ट नहीं थी तो पैदल ही जाना पड़ता था। एक माले से दूसरे माले के लिये मुड़ते वक़्त कॉर्नर पर दीवाल पर कमर की ऊँचाई पर अलग अलग भगवान की टाइल्स लगी होती थी।मैंने दोस्त को पूछा भगवान की तस्वीर, टाइल्स वहाँ क्यों लगी है तो बता रहा था इसके कारण स्टेयर केस साफ़ रहती है नहीं तो लोग वहाँ थूका करते थे।
वह चाल थी जहाँ अलग अलग मजहब के लोग रहते थे तो टाइल्स भी अलग अलग भगवान की लगी होती थी। पर वो होने वाले गंधगी पर कारगर इलाज था।
आज छोटे शहर के ज़्यादातर हर रास्ते के स्टार्टिंग पॉइंट का दुर्भाग्य है कि लोग अपने घर का वहाँ कचरा डाल देते हैं।कचरा इसलिए डालते हैं कि कारपोरेशन की गाड़ी आएगी और वो कचरा भर कर ले जाएगी। कचरा उठाने में उसे आसानी होगी। बहुत जगह तो कारपोरेशन ने ही कचरे के लिये कचरे की ओपन कुण्डी रखी होती है। रोज़ कचरा प्लास्टिक की थैली में पैक कर के रास्ते के किनारे, घर के बाहर रखने इतनी अमीरी अभी तक हम लोगों में नहीं आई है जो अक्सर परदेशों में देखने को मिलती है। किसी गली में हम एंटर करते हैं तो अक्सर कचरे की गंधगीका , बदबूं का सामना करना पड़ता है।
यह गंधगी जब मैं देखता था तो दिमाग़ में अक्सर आता था कि एक ‘ओपन कंपीटिशन’ रखेंगे और लोगों से ‘आईडिया’ माँगेंगे कि हर रास्ते का एंट्री पॉइंट कैसे बनाये जिससे वहाँ कोई कचरा न फेंके। वह साफ़ सुथरा और सुंदर लगे, वेलकमिंग लगे।
फिर यह बनते मंदिर को देखा तो लगा कुछ हद तक तो यह कांसेप्ट कारगर सिद्ध होगा। पर क्या हम एक ऐसा मंदिर बना सकते है जो सभी संप्रदायों को अपनासा लगे, जहाँ सबका शीष झूके। एक ऐसा सुंदर शिल्प जो सभी लोगों को ऊर्जा दे , शांति दे… एक ऐसा मंदिर जो अलग अलग संप्रदाय का नहीं तो देश का बन जाये, भारत का बन जाये?
क्या मालूम ऐसे मंदिर को देखकर भविष्य में समूचे विश्व का एक मंदिर, एक कॉमन भगवान बन जाये।
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है ना लाइफ इस ब्यूटीफ़ुल n मज़ेदार ?
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आनंद मल्हारा
४ अगस्त २०२४, जलगाँव
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