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तन्नू की शादी
५ सितारों वाली
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क्रमशः भाग २
अहमदाबाद निवासी समधीजी श्री प्रवेशजी मेहता के आग्रह के खातिर तन्नू की शादी “प्रथम” के साथ ‘गांधीनगर’ के “होटल लीला” में करना तय हुआ। गांधी नगर और उपर से लीला होटल तो मेरे लिए तो शादी एक “लिमिटेड एडिशन” हो गई। लिस्ट बनाई तो घर घर के ही १५०-१६० मेहमान हो गए। यार दोस्त सब कट गए।
लीला ९ माले की ऊँची होटल। करीब ३०० रूम्स । हमारे गेस्ट ५-६ माले पर, तन्वी का स्वीट ९ वे माले पर। समधी के रूम्स ३,४ और ८ माले पर । सभी प्रोग्राम और खानपान ग्राउंड और १ ले माले पर। पहले दिन तो सभी के लिए वो होटल एक भूल भुलैय्या बन गई थी। किसे कुछ समज नहीं आ रहा था। दूसरे दिन कुछ कम्फ़र्ट आया।
होटल में सुबह ७-८ बजे कुछ “अर्ली चेक इन” और बाक़ी के सुबह ११-१२ के बीच चेक इन हो जाएगा ऐसा की बुकिंग के वक़्त बात हुई थी। पर शादी के दो दिन पहले होटल से मेसेज आया ..”होटल पूरी बुक है तो अर्ली चेक इन की संभवना बहुत कम है।” फिर क्या कुछ गेस्ट जो जल्दी अहमदाबाद पहुँचे उन्हें दूसरी होटल या व्यवस्था करनी पड़ी। हमारी बस जो पहले डायरेक्ट होटल पहुँचने वाली थी तो हमने भी रास्ते में सुबह जैन धर्म शाला का सहारा लिया और ११.३० तक वहाँ पहुँचे। जब हम वहाँ पहुँचे तो साथ आया ढेर सारा लगेज का गेट पर स्क्रीनिंग करने २-२.३० घंटों का समय लग गया। वक़्त लग रहा था तो रूम मिलने के पहले लंच कर लिया और फिर रूम में गए कारण समय की बचत हो ।लंच के बाद तुरंत “हल्दी “ का नियोजन जो रखा था।
५ सितारा होटल है तो लगेज का स्क्रीनिंग, टाइम पर चेकइन सिस्टम के हिसाब से जरूरी बन जाता है। जबकि हर गेस्ट के आधार कार्ड तो पहले से ही उन्हें भेज दिए थे। गेस्ट्स को रूम की डिजिटल चाबी दी गई । लिफ्ट भी उसी चाबी को स्कैन करती थी और एक्टिवेट होती थी। उस चाबी से उसी फ्लोर पर, उसी रूम में जा सकते थे। दूसरे फ्लोर पर किसी के रूम में जाना हो तो मुश्किल । पहले नीचे जाओ, लिफ्ट मैन को रिक्वेस्ट करो या रिसेप्शन पर जाकर चाबी को मॉडिफाई कराओ और फिर उस फ्लोर पर पहुँचो। कभी चाबी रूम में रह जाती और दरवाजा लॉक हो जाता तो फिर वही परेशानी। दूसरी चाबी लेने फिरसे रिसेप्शन। नसीब था नीचे ग्राउंड फ्लोर जाने के लिए लिफ्ट में चाबी नहीं लगती थीं । हमारी मैडम को रूम से बाहर का कुछ भी काम कहा तो वो स्ट्रैट मना कर देती थी, मुझे डर लगता है लिफ्ट से..आप साथ चलो, कहाँ फस गई तो किसको आवाज दूँगी? होटल में नार्मल स्टेयरकेस कहाँ छुपी थी मालूम नहीं ।
फिर हमने सभी फ्लोर पर लिफ्ट से जा पाए ऐसी चाबी बनवा ली । लेकिन रूम में चाबियाँ इतनी हो जाती तो समझ ही नहीं आता कौनसी चाबी कौनसे फ्लोर की है। सभी चाबियाँ एक सरीखी जो थी। रूम में इंटरकॉम था पर कौनसा गेस्ट कौनसे रूम में है मालूम नहीं था। क्योंकि रूम नंबर्स पहले हमें मिले नहीं थे।
खैर जब होटल बड़ी होती है और मल्टी लेवल होती है तो एक दूसरे से फिजिकल कम्युनिकेशन मुश्किल हो जाता है। थैंक्स टू मोबाइल । सभी गेस्ट अधिकतर अपने अपने रूम में ही व्यस्त रहते है और होटल की लंबी लंबी लॉबी साम सुम दिखती । किसे क्या परेशानी है , किसे क्या जरूरत है समझ ही नहीं आता। प्रोग्राम के समय ही गेस्ट्स रूम के बाहर निकलते ।
पर मुझे आज भी शादी के लिए एक बड़ा “हॉल” एक सू व्यवस्थित “मंगल कार्यालय” जहाँ सब साथ रहे,एक दूसरे को दिखे और थोड़ी प्राइवेसी हो वो कॉन्सेप्ट ५ सितारा होटल के मुक़ाबले ज़्यादा बेहतर लगता है। जहाँ अपने बजट में सगे संबंधियों के साथ अपने दोस्त भी आ सके।
५ सितारा होटल है तो तन्नु की शादी भी उसी ठाट बाट से संपन्न हुई।
पर वहाँ तन्वी हम पर नाराज हो गई । आख़िरी दिन वो रो पड़ी और कहने लगी शादी मेरी थी और किसे भी मेरी परवाह नहीं थी । सब लोग ख़ुद में व्यस्त थे। मैं सबका इतना ख़याल रखती हूँ पर बताओ पापा मेरा किसने ख़याल रखा? आप कितने बार मुझसे मिलने उपर आए बताओ पापा ? मम्मी तू तो बोल ही मत तुझे तेरे मेकअप की पड़ी थी मुझे क्या चाहिए तूने पूछा कभी ?
बात सही थी पर पूरी सही नहीं थी…
क्रमशः भाग ३
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है ना लाइफ सितारों वाली…!
आनंद मल्हारा
५ जनवरी २०२५ , जलगांव
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